सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 278

२३८ सौंदर्य लहरी
रूप धारण किये हुए हैं, और जो अग्नि और सूर्य के ताप से
संतप्त त्रिभुवन पर वर्षा कर रहे हैं।
मणिपूर चक्र में मेघेश्वर और सौदामिनी के रूप में शिव शक्ति
का ध्यान बताया गया है। सूर्य का स्थान ऊपर सूर्य मण्डल में
और अग्नि का स्थान नीचे स्वाधिष्ठान चक्रस्थ अग्नि मण्डल में होने
के कारण, दोनों के ताप से सारा देहरूपी तीन खण्डों का त्रिभुवन
तप्त होने पर जल बाष्प रूप से मणिपूर चक्र मे मेघों का रूप धारण
कर लेता है और मेघों मे अग्नि विद्युताकार चमकने लगती है ।
जिन को मेघेश्वर और सौदामिनी कहते हैं, और दोनों के योग से
वर्षावत् सारे शरीर मे रस का सिंचाव होने लगता हैं।
मूलाधार
( ४१ )
तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया
शिवा ( नवा ) त्मान मन्ये नवरस महाताण्डवनटम् ।
उभाभ्यामेताभ्यामुद(भ)य विधिमुद्दिश्य दयया
सनाथाभ्यां जज्ञे जनक जननीमज्जगदिदम् ॥
अर्थ:— तेरे मूलाधार में लास्यपरा अर्थात् नृत्य करती हुई
समया देवी के साथ, नवधा रसपूर्ण ताण्डव नृत्य करने वाले नट-
श्वर नवात्मा-शिवजी का मैं चिन्तन करता हूं। यह जगत् इन दोनों
की जनक जननीवत् दया से प्रभवाभिमुख होने के कारण अपने
को सनाथ मानता है।