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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 160

११४ सौन्दर्य लहरी
शक्ति जागरण से काय संपत् विभूति भी प्राप्त हो सकती है,
जो षट चक्र वेध द्वारा पंच महा भूत जय होने पर होती है। रूप,
लावण्य, बल, और शरीर का वज्रवत संगठित होना काय संपत्
कहलाता है। देखे योग दर्शन (३, ४५-५६)। भूत जय से
अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति भी होती है। अणिमादि सिद्धियों का
श्री चक्र के सब से बाह्य चतुष्कोण पर स्थान दिखाया जाता है और
इन सिद्धियों का फल भी युवावस्था की एक गौण सिद्धि है। प्रत्येक
नाडी में अमृत का संचार होने का फलस्वरूप ही यह काय संपत्
है। श्लोक १० में प्रपंचं सिञ्चन्ती पद में अमृत से प्रत्येक नाडी
का भर जाना दिखाया गया है, जिससे देह दिव्य हो जाता है। वह
मनुष्य उर्ध्व रेता हो जाता है, उसके शरीर की glands में
रसोत्पादन की शक्ति इतनी बढ जाती है कि शरीरस्थ निर्माण
शक्ति का ह्रास बन्द हो जाता है। उसके स्नायुओं में जीवन शक्ति
संचार करने लगती है, और सातों धातुओं का पुनः निर्माण होने
लगता है। ज्ञानेश्वरी के छःटे अध्याय में कुण्डलिनी जागरण से
शारीरिक कल्प होने की बात इन शब्दों में कही गई है—
“तब अवयवों की कान्ति की शोभा ऐसी दिखाई देती है कि
मानों वह स्फटिक का ही हो, अथवा संध्या काल के आकाश के
रंग निकालकर उनका ही वह शरीर बनाया गया हो, अथवा आत्म
ज्योति का लिंग ही स्वच्छ किया रखा हो इत्यादि। कुण्डलिनी
जब चन्द्रामृत पीती है, तब ऐसा शरीर हो जाता है, कृतान्त भी
उस देहाकृति से भय खाता है, वार्धक्य पीछे हटता है, यौवन की
गांठ खुल जाती है, और लुप्त हुई बालदशा फिर प्रकट
होती है। इत्यादि।”