सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी ११३
अगले श्लोक में यह दिखाया गया है कि कुंडलिनी के जागरणो-
परान्त अमृत सिंचन स्वरूप भगवती की कृपा
काय सम्पत् से शारीरिक कल्प हो जाता है । अर्थात् वृद्ध
सिद्धि मनुष्य भी युवा हो जाता है ।
[ १३ ]
नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं
तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः ।
गलद्वेणीबंधाः कुचकलशविस्रस्तसिचया
हठात्त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः ॥
कठिन शब्दों का अर्थः—नर्म=क्रीडा, विस्रस्त=गलित,
कांची=मेखला ।
अर्थः—वयोवृद्ध, देखने में कुरूप, क्रीडा में जड मनुष्य
भी तेरी दृष्टि के पडने मात्र से ऐसा रमणीय हो जाता है कि
सैंकडों युवतियां उसके पीछे भागने लगती हैं, जिनके बेणी के
बन्ध खुल गये हैं, कुच कलशों पर से चोली फट गई है,
जिनकी मेखला हटात् टूट गई हैं और जिनकी साड़ी शरीर से
उतरी जा रही हैं ।
सं० टि०:—यहां काम कला ईं की ओर संकेत है ।