सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० सौन्दर्य लहरी
त्रिकोण बनाओ, तीनों के योग से अष्टार स्पष्ट बन जाता है ।
फिर तीसरा शक्ति और दूसरा शिव त्रिकोण बनाने से अन्तर्दशार
बन जाता है, फिर चौथा शक्ति और तीसरा शिव त्रिकोण बनाने
से बहिर्दशार और फिर पांचवां शक्ति और चौथा शिव त्रिकोण
बनाने से चतुर्दशार बन जाता है । यह सृष्टि क्रम है जिसमें शिव
के त्रिकोण नीचे को उतरते हैं और शक्ति त्रिकोण ऊपर को चढते
हैं अर्थात् शिव त्रिकोणों का मुख नीचे की ओर और शक्ति
त्रिकोणों का मुख ऊपर की ओर होता है । इसके विपरीत जब शिव
के त्रिकोण ऊपर चढते हैं और शक्ति त्रिकोण नीचे को उतरते हैं,
उसे लय क्रम समझना चाहिये । क्योंकि शिव त्रिकोण उर्ध्वमुख
और शक्ति त्रिकोण अधोमुख हो जाते हैं । यह क्रम बाह्य
उपासना में ग्रहण किया जाता है, परन्तु अन्तरुपासना में जब शक्ति
मूलाधार से सहस्रार में चढती है तो लय क्रम होता है क्योंकि तब
शिव भाव की वृद्धि होती है और जब शक्ति नीचे उतरती है तब
जीव भाव की वृद्धि होती है, इसलिये यह प्रभव क्रम है ।
ऊपर के दो श्लोकों में भगवती का अन्तः और बाह्य ध्यान
पूजन बताया गया है । आज्ञा चक्र के ऊपर
भगवती का सौंदर्य अमृत की वर्षा करती हुई ज्योतिर्मयी भगवती
कल्पनातीत है का ध्यान करते समय देवी के सौंदर्य की कल्पना
का वर्णन इस श्लोक में है । परन्तु वह वैखरी बाणी का विषय नहीं,