सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 415 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 155

सौंदर्य लहरी १०९
का १/८ भाग मिटाना है। गै रेखा के सिरों पर से ५/८८ वां और र्द रेखा
के सिरों से ७/३२ भाग, जै और र्ड रेखाओं के सिरों पर से ३/८ भाग
और टें रेखा के सिरों पर से ३/८ भाग मिटा दो, चै औ तै रेखाएं
पूरी रहेंगी । खडी रेखा पर कं बिन्दु के ६ विभाग ऊपर वाले
अन्तर्वृत्तस्थ बिन्दु को स मानों और पं बिन्दु से ६ विभाग नीचे
वाले अन्तर्वृत्तस्थ बिन्दु को ह मानो । ह को चै वाली रेखा के
सिरों को मिलाने से चौथा श्रीकंठ (शिव-त्रिकोण) बनता है, पं बिन्दु
को गै रेखा के मिटाने के पश्चात् नये सिरों को मिलाने से
तीसरा, र्द बिन्दु को जै रेखा के मिटाने के पश्चात् नये सिरों
को मिलाने से दूसरा, और तैं बिन्दु को कें रेखा के नये सिरों
को मिलाने से प्रथम श्रीकंठ बनता है। इसी प्रकार जैं बिन्दु को पं.
रेखा के नये सिरों को मिलाने से प्रथम शक्ति त्रिकोण, चै बिन्दु
को टें रेखा के सिरों को मिलाने से दूसरा, गै बिन्दु को र्ड रेखा से
मिलाने से तीसरा, कें बिन्दु को र्द रेखा से मिलाने से चौथा और
स बिन्दु को तैं रेखा से मिलाने से पांचवां शक्ति त्रिकोण बनता है।
उक्त ९ त्रिकोणों को बनाने का क्रम इस प्रकार होना चाहिये,
जिससे मध्य त्रिकोण, अष्टार, अन्तर्दशार, बहिर्दशार, और चतु-
र्दशार चक्रों का निर्माण क्रमशः सामने आता जाय ।
पहिले प्रथम शक्ति त्रिकोण बनाओ, फिर दूसरा शक्ति त्रिकोण
बनाने से मध्य त्रिकोण स्पष्ट दिखने लगता है। वैसे तो वह प्रथम
शक्ति त्रिकोण के बनने से ही टें रेखा के ऊपर दिखने लगता है
दूसरे शक्ति त्रिकोण की उसे अपेक्षा नहीं है। फिर प्रथम शिव