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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 415 में से

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विद्याधिराज था । शिवगुरुजी को संतान न होने के कारण उन्होंने
शिवजी की आराधना की, जिस के फल स्वरूप भगवत्पाद का
जन्म हुआ । बाल शंकर का उपनयन संस्कार ५ वें वर्ष में हुआ और
असाधारण विशद बुद्धि होने से ८ वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने
वेदाध्ययन एवं १२ वें वर्ष में सब शास्त्राभ्यास समाप्त कर लिया, और
उसी समय उनके पिता के भौतिक देह का परित्याग करदेने पर
तत्पश्चात् ही ब्रह्मचर्य अवस्था में ही तीव्र वैराग्य उदय होने पर श्री
श्रीगोविन्द पादाचार्य से ॐ कारेश्वर क्षेत्र में नर्मदा तटपर संन्यास
दीक्षा ली । और १६ वर्ष की अवस्था में काशी जाकर प्रस्थान
त्रयी पर भाष्य लिखे । तदन्तर सनातन वैदिक धर्म के पुनर्संस्थापन
का अलौकिक कार्य किया; और तत्कालीन प्रचलित अवैदिक धर्म
संप्रदायों को निरस्त किया । अद्वैत वेदान्त के सिद्धांत की विश्व
में सुदृढ नींव कायम करने का एकांत श्रेय श्रीमच्छंकर भगवत्पाद
को ही है । इतना सब कुछ आलौकिक कार्य ३२ वर्ष के अल्प
समय में संपादित करके सन ८२० ई. में अपना प्रातः स्मरणीय
नाम सदा के लिये छोडगये ।
भगवत्पाद के घराने में परंपरागत सांबशिव उपासना चली आती
थी । उनके श्रींगेरी आदि मठों में शिव व शार्दादि की शक्ति
उपासना अद्यापि प्रचलित है शिव से निर्गुण परमतत्व प्राप्ति का ज्ञान
मार्ग और शक्ति से शुद्धविद्या की उपासना समझना चाहिये ।
कांची मठ में श्रीचक्र की तांत्रिक उपासना समयाचार पद्धति के
अनुसार आज भी होती है, जहां भगवत्पाद का विद्यार्थी कालीन
आचार्य कुल था ।' सौन्दर्यलहरी के ११ वें श्लोक में श्रीचक्र का