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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

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प्राक्कथन
निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम् ।
सदयहृदयदर्शितपशुघातम् ।
केशवधृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥
—गीतगोविन्द
हिन्दुओं के दशावतारों में एक भगवान् बुद्ध भी हैं। मध्यदेश में भगवान्
बुद्ध और उनके शिष्यों ने जनभाषा में कल्याणकारी उपदेश दिया था। काल-
क्रम से बुद्ध-निर्वाण के कोई चार सौ साल बाद इसी मध्यदेश के महाकवि
अश्वघोष ने संस्कृत में 'बुद्धचरित' और 'सौन्दरनन्द' नामक दो महाकाव्यों
की उत्कृष्ट रचना की है। बुद्ध के उपदेश के लिए दोनों ही ग्रन्थ एक-दूसरे के
पूरक हैं। परन्तु काव्य की दृष्टि से सौन्दरनन्द उत्कृष्ट है। साधारण जनता को
और विद्वानों को भी प्राणिमात्र के मोक्षतत्त्वों का परिचय सुन्दर तथा सुबोध
रीति से कराना ही 'सौन्दरनन्द' की निर्मिति का मूल उद्देश्य है।
प्रज्ञा और करुणा की महत्ता, संसार की अनित्यता और वस्तुमात्र का
क्षण-प्रतिक्षण में प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्त के अनुसार उत्पत्ति, स्थिति और
विनाश होना—मौलिक बौद्ध-सम्प्रदाय के प्रमुख विचार थे। मर्त्य-मानव संसार
की क्षणभंगुरता देखने पर भी अपने को व्यर्थ और चिरञ्जीव समझता है।
आधि-व्याधियों से व्याप्त जीवन में अपनी आशाओं के पीछे दौड़ता है और दुःख
तथा क्लेश से परास्त होता है। प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्त के आधार पर
तथागत ने नन्द को मुक्तिमार्ग का उपदेश दिया है। इससे भी बढ़कर इस
ग्रंथ में मुक्ति और शान्ति का संदेश है। सदाचार और चित्तशुद्धि की शिक्षा
है, आत्मोन्नति और लोकोपकार की प्रेरणा है।
सर्वत्र पठन-पाठन में इस ग्रन्थरत्न का समावेश है। संस्कृत-हिन्दी में
इसकी परिनिष्ठित व्याख्या का होना आवश्यक समझकर ही मैंने यह प्रयास
किया है। मैं डॉ० देवनारायण मिश्र और स्वर्गीय ई. एच. जोन्स्टन का हृदय
से आभारी हूँ। इनके ग्रंथों से मैंने व्याख्या-लेखन में पर्याप्त सहायता प्राप्त
की है।
यह व्याख्या लिखने में मुझे जोन्स्टन कृत अंग्रेजी अनुवाद से बड़ी सहायता
मिली है। भूमिका लिखने में भोलाशंकर व्यास कृत 'संस्कृत-कवि-दर्शन' के