सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
२६ सात्त्वतसंहिता
आएगा क्योंकि दोनों ही अभिन्न हैं। इस प्रकार दोनों प्रकारों से मन्त्र की कल्पना कर
अर्चन करे। किन्तु नाम मन्त्र के आदि में ही पिण्डाक्षर अथवा बीज का संयोजन करे।
इसी प्रकार पद मन्त्र में भी आदि में बीजाक्षर अथवा पिण्डाक्षर की योजना करे।
फिर प्रणव पीठ पर नमस्कार युक्त ध्वज लगावे। दोनों ही शान्त स्वरूप हैं, अतः एक
ही हैं। संज्ञा मन्त्र और पद मन्त्र संसिद्धि लक्षण वाले हैं।
स्वर से उत्पन्न एक अक्षर तथा व्यञ्जन से उत्पन्न एक अक्षर बीज कहे जाते हैं।
एक में मिले हुए स्वर और व्यञ्जन से जो बहुत वर्ण बन जाते हैं, वह पिण्ड मन्त्रराट्
है। स्वर वर्ण के आदि के तथा अन्त के दो-दो अक्षर अनुस्वार युक्त हों तो उनमें
स्वाभाविक मन्त्रता सिद्ध है। अनुस्वार सहित एक स्वर से युक्त व्यञ्जन अथवा अनुस्वार
सहित दो स्वर से युक्त ककारादि व्यञ्जन की भी बीज संज्ञा होती है ॥ २१ ॥
ॐकार शब्द का विवर्त्त सूर्य की किरणों के समान अनेक है अर्थात् ओंकार पर
है तथा बीज, पिण्ड एवं संज्ञा मन्त्र क्रमशः तुर्य, सुषुप्ति और स्वप्न के क्रम से सूक्ष्म
है। पदमन्त्र वैखरी होने से स्थूल है। उसी ॐकार के उच्चारण करने से परिणाम
स्पष्ट जाना जाता है। वह कभी स्तुति सम्बोधन लक्षण वाला तथा बहुत अक्षरों वाला
होता है और कहीं बहुत पदों वाला बन जाता है। वह ॐकार अविनाशी है और बीजों
को महान् समृद्धि देने वाला है। अतः साधक सर्वप्रथम सत्य नामक प्रणव से आसन
प्रदान करे।
इस प्रकार प्रणव के नित्योदित होने के कारण तथा सभी मन्त्रों का आधार होने
के कारण पहले प्रणव का आसन सन्निविष्ट करे। उसके बाद उसके विवर्त्तभूत बीज
मन्त्र को आसन देवे। प्रतिदिन आराधन काल में बीज से उसके परिणाम स्वरूप
संज्ञामन्त्र, अथवा पदमन्त्र में किसी एक का उत्थान करे। फिर यजन समाप्त होने पर
उसी में लय करे। इसलिये वह अविनाशी है। याग का अवसर प्राप्त होने पर पुनः
उसकी समाप्ति हो जाने पर मन्त्र उस ॐकार में इस प्रकार सन्निहित हो जाते हैं, जैसे
तप्त पत्थर पर जल डालने से जल उसमें लीन हो जाते हैं।
सात्त्वतागम
कृष्ण द्वारा कुब्जा से उत्पन्न उपश्लोक ने जो सात्त्वत आगम के प्रवर्तक माने जाते
हैं, उन्होंने महर्षि नारद से भक्ति तत्त्व का अध्ययन किया था और सात्त्वत आगम नामक
एक ग्रन्थ भी लिखा था जिसका उल्लेख श्रीमद्भागवत् पुराण की श्लोकबद्ध टीका
'नारायणीयम्' में मेलपुत्तूर नारायणभट्ट ने किया है। 'कृष्णगीति' नामक ग्रन्थ में भी
मानवेद ने इस सात्वत परम्परा का उल्लेख किया है।
आगम के क्रिया, चर्या आदि चार विभागों में से चर्या नामक विभाग का बहुत कम
वर्णन मिलता है। आगमों में ज्ञानपाद की मुख्य चर्चा की गई है और मन्त्र शास्त्र (शब्द
ब्रह्म) को पूर्ण रूप से पोषित किया गया है। क्रियापाद मात्र प्रतिमा की प्रतिष्ठा एवं
उसकी चार रूप से पूजा में प्रतिपादित है। चार रूप है—विग्रह, अर्घ पात्र, मन्त्र एवं
भूमिका २७
हवन। सात्वत संहिता में प्रतिमा निर्माण के विषय में पच्चीसवें अध्याय में विस्तृत वर्णन
प्राप्त है।
सात्त्वतसंहिता में मुख्य रूप से भगवान् विष्णु प्रतिपादित हैं। लक्ष्मी भगवान् विष्णु
की शक्ति होने से उनके समकक्ष ही नहीं बल्कि उनसे भी अधिक हैं। आगम की प्राच्य
परम्परानुसार लक्ष्मी भगवान् विष्णु की प्रकृति हैं और दिव्य शक्ति है। वह विष्णु के शरीर
से छः रूपों में प्रकट होती है—१. ज्ञान (Knowledge), २. ऐश्वर्य
(Sovereignty), ३. शक्ति (Potency) ४. बल (Strength), ५. वीर्य
(Virility), ६. तेजस् (Splendour).
पाञ्चरात्रागम में परब्रह्म के उभय-निर्गुण तथा सगुणभाव स्वीकृत हैं। परमात्मा
त्रिविध परिच्छेद शून्य है वह न भूत है, न वर्तमान है और न भविष्य, न ह्रस्व है, न दीर्घ,
न स्थूल है, न अणु, न आदि है, न मध्य है और अन्तविहीन भी है। इस प्रकार वह
सब द्वन्द्वों से विनिर्मुक्त, सर्व उपाधि से विवर्जित सब कारणों का कारण, षाड्गुण्यरूप
परब्रह्म है।
षाड्गुण्य
विष्णु 'निर्गुण' होकर भी 'सगुण' हैं। वह अप्राकृत गुणों से रहित होने के
कारण 'निर्गुण' है और षड्गुण युक्त होने से 'सगुण' हैं। जगत् के व्यापार के लिए
कल्पित इन छह गुणों के नाम—१. ज्ञान, २. शक्ति, ३. ऐश्वर्य, ४. बल, ५. वीर्य एवं
६. तेज हैं।
१. अजड़, स्वात्म सम्बोधी (=स्वप्रकाश), नित्य सर्वावगाही गुण को 'ज्ञान' कहते
हैं। ज्ञान ब्रह्म का स्वरूप भी है तथा उसका गुण भी है।
२. शक्ति से अभिप्राय है जगत् का उपादान कारण।
३. ऐश्वर्य का अर्थ है स्वातन्त्र्यपरिबृंहितं जगत्कर्तृत्व।
४. जगत् का निर्माण करने में भगवान् नारायण को तनिक भी आभास नहीं होता।
इस श्रमाभाव को 'बल' कहते है।
५. जगत् के उपादान होने पर भी विकार राहित्य की पाञ्चरात्रगत शास्त्रीय संज्ञा
'वीर्य' है। कार्यावस्था में जगत् के समस्त उपादान कारणों में विविध विकार दृष्टिगोचर
होते हैं। परन्तु निर्विकार ब्रह्म (=भगवान्) में जगदुपादान होने पर भी किसी प्रकार के
विकार का उदय नहीं होता। यही विकार राहित्य है।
६. जगत् की सृष्टि में सहकारी की अपेक्षा न होना अर्थात् अनावश्यकता को 'तेज'
कहते हैं।
पाञ्चरात्र की ब्रह्मकल्पना
इस प्रकार ब्रह्म में जगत् की उभयविध कारणता (=अर्थात् उपादान कारणता तथा
निमित्त कारणता) है। ब्रह्म बिना किसी सहायता के स्वतन्त्रतापूर्वक अपने से ही इस दृष्टि
२८ सात्त्वतसंहिता
का उत्पादक है। 'सर्वकारणकारण' विशेषण इसी सर्वशक्तिमत्ता तथा स्वतन्त्रता को द्योतित
करता है। वासुदेव का ज्ञान ही उत्कृष्ट रूप है, शक्त्यादि अन्य पाँच गुण ज्ञान के गुण
भगवान् की शक्ति होने से सर्वदा तत्सम्बद्ध रहते हैं।
भगवान् की शक्ति
भगवान् की शक्ति को सामान्यतः 'लक्ष्मी' नाम से अभिहित किया गया है।१
भगवान् शक्तिमान् हैं तथा लक्ष्मी उनकी शक्ति है। भगवान् तथा लक्ष्मी का पारस्परिक
सम्बन्ध आपाततः द्वैत प्रतीत होता है। परन्तु दोनों में द्वैत नहीं है।
नारायणी शक्ति का रूप
प्रलय दशा में जब प्रपञ्च का क्षय हो जाता है तब भी भगवान् तथा लक्ष्मी का
नितान्त ऐक्य नहीं होता। उस समय भी नारायण तथा नारायणी शक्ति मानो३ एकत्व
धारण करते हैं।
शक्ति तथा शक्तिमान् का सम्बन्ध
धर्म तथा धर्मी, अहन्ता तथा अहं, चन्द्रिका तथा चन्द्रमा, आतप तथा सूर्य के
समान ही शक्ति तथा शक्तिमान् में अविनाभाव या समभाव सम्बन्ध स्वीकृत किया गया है।
किन्तु मूल में तो भेद रहता ही है।
भगवान् की शक्ति
भगवान् की आत्ममूला शक्ति आरम्भकाल में किसी अचिन्त्य कारण के वश कहीं
उन्मेष प्राप्त करती है और वह जगद् रचना व्यापार में प्रवृत्त होती है। विष्णु की स्वातन्त्र्य
रूपी शक्ति भिन्न-भिन्न गुणों के कारण विभिन्न नामों से पुकारी जाती है। आनन्दा,
स्वतन्त्रा, लक्ष्मी, श्री, पद्मा आदि उसी के नामान्तर हैं। उसी लक्ष्मी के सृष्टिकाल में दो
रूप हो जाते हैं—१. क्रियाशक्ति, तथा २. भूतशक्ति।
भगवान् की जगत् सिसृक्षा (जगत् उत्पन्न करने के संकल्प) को 'क्रियाशक्ति' कहते
हैं और जगत् की परिणति (भवनं भूतिः) की संज्ञा 'भूतशक्ति' है। अहिर्बुध्न्य संहिता में
ही लक्ष्मी को इच्छाशक्ति तथा सुदर्शन को 'क्रियाशक्ति' कहा गया है। इन दोनों शक्तियों
के अभाव में भगवान् स्वयं अकिञ्चित्कर हैं। शक्तिद्वय के सद्भाव में ही भगवान् जगत्
की सृष्टि, स्थिति, तथा संहति व्यापार के उत्पादक हैं। लक्ष्मी शक्ति के उस प्रथम
आविर्भाव को 'शुद्ध-सृष्टि' या गुणोन्मेष कहते हैं। तब तरङ्गरहित प्रशान्त समुद्र में प्रथम
बुद्बुद् के समान परब्रह्म में ज्ञानादि षड्गुणों का प्रथम उदय होता है। इसी शक्ति के
विकास से जगत् की सृष्टि सम्पन्न होती है। सृष्टि शुद्ध और शुद्धेतर भेद से दो प्रकार
की होती है। इसी के भीतर जयाख्य संहिंतानुसार शुद्ध सर्ग, प्राधानिक सर्ग तथा ब्रह्म
सर्ग का अन्तर्भाव किया जाता है।
शुद्ध सृष्टि
भगवान् जगत् के परम मङ्गल के लिए अपने ही आप चार रूपों की सृष्टि करते
हैं—१. व्यूह, २. विभव, ३. अर्चावतार तथा ४. अन्तर्यामी अवतार।
भूमिका २९
(१) व्यूह—पूर्वोक्त षड्गुणों में से दो-दो गुणों की प्रधानता होने पर तीन व्यूहों की
सृष्टि होती है—
सङ्कर्षण में ज्ञान तथा बल गुण का प्राधान्य रहता है।
प्रद्युम्न में ऐश्वर्य तथा वीर्य गुणों का आधिक्य रहता है।
अनिरुद्ध में शक्ति तथा तेज का उद्रेक विद्यमान रहता है।
इन तीनों के सर्जनात्मक तथा शिक्षणात्मक द्विविध कार्य होते हैं—
(क) सङ्कर्षण का कार्य जगत् की सृष्टि करना तथा ऐकान्तिक मार्ग (= पाञ्चरात्र
तत्त्व) का उपदेश करना है।
(ख) प्रद्युम्न का कार्य ऐकान्तिक मार्ग सम्मत क्रिया की शिक्षा देना है।
(ग) अनिरुद्ध का कार्य क्रियाफल (मोक्ष तत्त्व) का शिक्षण करना है।
वैषम्य दशा में गुण-प्रधान भाव से षड्गुणों की व्यवस्था की जाती है। षाड्गुण्य
चारों व्यूहों में सामान्यतः विद्यमान रहता है। वासुदेव को मिलाकर इन्हें ‘चतुर्व्यूह’ कहते
हैं। चतुर्व्यूह भगवद्रूप ही है। परन्तु शङ्कराचार्य के अनुसार वासुदेव से सङ्कर्षण अर्थात्
जीव की उत्पत्ति होती है। सङ्कर्षण से प्रद्युम्न अर्थात् मन की तथा प्रद्युम्न से अनिरुद्ध
अर्थात् अहंकार की सृष्टि होती है। यही चतुर्व्यूह सिद्धान्त पाञ्चरात्र का विशिष्ट सिद्धान्त
माना जाता है। जयाख्य आदि संहिताओं में यह मत नहीं मिलता। परन्तु महाभारत के
नारायणीयोपाख्यान तथा लक्ष्मीतन्त्र में निर्दिष्ट होने से यह पाञ्चरात्र का एकदेशीय मत ही
प्रतीत होता है।
(२) विभव—विभव का अर्थ है ‘अवतार’। ये संख्या में ३९ (सात्त्वतसंहिता में
३८) माने जाते हैं। विभव (= अवतार) मुख्य तथा गौड़ दो प्रकार के होते हैं—
(क) मुख्य—जिनकी उपासना भुक्ति के लिए की जाती है।
(ख) गौड़—जिनकी पूजा मुक्ति के लिए की जाती है।
ये ३९ विभव इस प्रकार हैं—
१. पद्मनाभ, २. ध्रुव, ३. अनन्त, ४. शक्त्यात्मा, ५. मधुसूदन, ६. विद्याधिदेव,
७. कपिल, ८. विश्वरूप, ९. विहङ्गम, १०. क्रोडात्मा, ११. वडवावक्त्र, १२. धर्म,
१३. वागीश्वर, १४. एकाम्भोनिधिशायी, १५, भगवान् कमठेश्वर, १६. वराह, १७.
नरसिंह, १८. पीयूषहरण, १९. श्रीपतिभगवान् देव, २०. कान्तात्मा, २१. अमृतधारक,
२२. राहुजित्, २३. कालनेमिघ्न, २४. पारिजातहर, २५. लोकनाथ, २६. शान्तात्मा,
२७. महाप्रभु दत्तात्रेय, २८. न्यग्रोधशायी, २९. भगवान् एकशृङ्गतनु, ३०. वामनदेह,
३१. सर्वव्यापी त्रिविक्रम, ३२. नर, ३३. नारायण, ३४. हरि, ३५. कृष्ण, ३६.
ज्वलत्परशुधृक्-राम (=परशुराम), ३७. धनुर्धर राम, ३८. वेदविद् भगवान् कल्की,
३९. पातालशयन।
(३) अर्चावतार—पाञ्चरात्र विधि से पवित्रित किए जाने पर भगवान् की प्रस्तर
३० सात्त्वतसंहिता
आदि की मूर्तियाँ भी भगवान् का अवतार मानी जाती हैं । सर्वसाधारण की पूजा में इनका
उपयोग होता है । इन्हीं का नाम 'अर्चावतार' है ।
(४) अन्तर्यामी—भगवान् सब प्राणियों के हृत्पुण्डरीक में वास करते हुए वे उनके
समस्त व्यापारों के नियामक हैं । इस रूप का नाम 'अन्तर्यामी' रूप है । यह कल्पना
उपनिषदों के आधार पर ही है ।
शक्तितत्त्व
(i) एक तत्त्व से चार तत्त्व—
(१) वेदों में आनन्द, ज्ञान, इच्छा, क्रिया एवं आवरण इन पाँच गुणों का समुदाय
'शक्ति' शब्द से अभिहित होता है । उसी को आगमों में ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य
और तेज—इन षड्गुणों के समुदाय को 'शक्ति' कहा गया है । (२) इनमें अवच्छेद रूप-
आवरणशक्ति 'माया' है । माया रूप अवच्छेद से अवच्छिन्न, अखण्ड खण्डवत्, शान्त
अशान्तवत्, अद्वय द्वयवत् रूप से भासता है, परन्तु वह प्रतिभान मिथ्या नहीं है । (३)
माया (प्रकृति) के गुण भेद से वह तीन रूपों में—सत्त्वगुण से विष्णु, रजोगुण से ब्रह्मा
एवं तमोगुण से शिवरूप में प्रकट होता है । इनके कार्य क्रमशः स्थिति, उत्पत्ति एवं प्रलय
हैं । (४) धर्म, ज्ञान, वैराग्य एवं ऐश्वर्य इन चार गुणों के योग से वह एक ही क्रमशः
वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध—इन चार रूपों में प्रकट हुआ है ।
(ii) चार से लेकर सोलह तत्त्व—
वासुदेव आदि वही चार रूप, चार वर्ण, चार आश्रम, चार युग एवं चार पुरुषार्थ
आदि परमात्मा के चार-चार रूप हैं । (५) शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध—इन पाँच
गुणों के कारण क्रमशः परमेष्ठि, पुमान्, विश्व, निवृत्ति एवं सर्व—ये परमात्मा के पाँच
रूप है । (६) श्रोत्र, चक्षु, घ्राण, रसना, त्वक् एवं मन—ये परमात्मा के ही छह रूप है ।
वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त एवं शिशिर—इन छह ऋतुओं के रूप में भी वह
प्रजापति ही परिणत हुआ है । (७) भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः एवं सत्य—इन
सात व्याहृतियों में वही परिणत हुआ है । गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति,
त्रिष्टुप्, जगती—ये सात छन्द भी उसके ही रूप हैं । अग्निहोत्र, दर्श, पौर्णमास,
चातुर्मास्य, वाजपेय, अतिरात्र और ज्योतिष्टोम—ये सात रूप हैं, उन रूपों में भी परमात्मा
ही परिणत हुए हैं । (८) अव्यक्त, महत्, अहंकार तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं
गन्ध—इन आठ रूपों में परमात्मा ही परिणत होते है । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश,
चन्द्र, सूर्य एवं यजमान—इन आठ मूर्तियों के रूप में वही ईश्वर परिणत हुए हैं । इसी
प्रकार आठ दिक्पाल, आठ गुण एवं आठ सिद्धियाँ आदि रूपों में भी वही चैतन्य स्थित
हैं । (९) नरसिंह, वराह, वामन, राम, कृष्ण, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य और चन्द्र—ये नौ रूप भी
उन्हीं विश्वात्मा की विभूति है । (१०) इन्द्र, अग्नि, यम, निकृति, वरुण, वायु, सोम,
ईशान, ब्रह्मा, अनन्त-नाग—इन दस रूपों में भी वही विद्यमान है । (११) पाँच
ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय एवं मन—ये ग्यारह भी भगवान् विष्णु के ही रूप हैं । (१२)
इन्द्र, भग, पूषा, पर्जन्य, अंशु, विष्णु, त्वष्टा, धाता, विवस्वान्, वरुण, अर्यमा,
भूमिका ३१
भिन्न—ये बारह आदित्य भी परमात्मा के ही विभिन्न रूप हैं। (१३) विश्वदेव, (१४)
चौदह मनु (१५) पन्द्रह तिथि एवं (१६) सोलह दिशा-विदिशाओं के रूप में वहीं एक
तत्त्व परिणत हुआ है। इस प्रकार सभी देवों के आश्रय एवं उपादान कारण विष्णु हैं।
विष्णु ही सब देवता हैं। सम्पूर्ण चराचर विष्णु से व्याप्त है। फिर जिनसे सारी सृष्टि हुई है
एवं अन्त में जिनमें लीन हो जायेगी, उन पुण्डरीकाक्ष को छोड़कर दूसरा कौन विश्व को
व्याप्त करके रह सकता है।
भगवान् विष्णु के व्यूह का रहस्य
परब्रह्म परमात्मा प्रकृति परे हैं। वह मानव-मनोभूमि से अतीत हैं। किन्तु वह
प्रकृति से परे हैं और परे भी नहीं है। परमात्मा प्रकृति से परे भी है और प्रकृति में भी है।
त्रिपाद् रूप से वे प्रकृति से परे है और एकपाद्रूप से प्रकृति में हैं। इस प्रकार परमात्मा
की दो विभूतियाँ हैं—
१. त्रिपाद्विभूति और २. एकपाद्विभूति।
त्रिपाद्विभूति को ‘नित्यविभूति’ कहते है और एकपाद्विभूति को ‘लीलाविभूति’
कहते हैं। इस एकपाद्विभूति में भगवान् विष्णु जगत् के उदय, विभव और लय की
लीला किया करते है। आत्माराम, आप्तकाम परमात्मा का प्रकृति के साथ यह विहार
चिरन्तन है, अनादि तथा अनन्त भी है। इस विहारस्थली के देश-काल का ज्ञान मानव
मनीषा में नहीं समाता। मनुष्य यह जान नहीं सकता कि भगवान् जिस प्रकृति-नटी के
साथ अपना महारास कर रहे हैं उसका परिमाण केवल इतना है। वस्तुतः प्रकृति के
असंख्य ब्रह्माण्ड भाण्डों को अहर्निश बनाने बिगाडने के अनवरत कार्य को समग्ररूप में
जानने की शक्ति किसी व्यक्ति के मस्तिष्क में नहीं है। यह जानना भी कठिन है कि प्रकृति
के साथ भगवान् का यह विहार कब प्रारम्भ हुआ और कब तब चलेगा।
इस जगत् की तीन अवस्थाएँ हैं—सृष्टि, स्थिति और प्रलय। जड प्रकृति में
परमात्मा के ईक्षण से—संकल्प से कभी तो विकासोन्मुख परिणाम हुआ करता है, जिसे
‘सृष्टि’ कहते हैं और कभी विनाशोन्मुख, जिसे ‘प्रलय’ कहते हैं। सृष्टि और प्रलय के
मध्य की दशा का नाम ‘स्थिति’ है। जब परमात्मा जगत् की रचना करते हैं, तब वे
‘प्रद्युम्न’ होते हैं और जब पालन करते हैं तब ‘अनिरुद्ध’ और जब संहार करते है तब
‘सङ्कर्षण’ कहलाते हैं—इन रूपों की संज्ञा ‘व्यूह’ है।
**सङ्कर्षण—**भगवान् विष्णु में यद्यपि अनन्त कल्याण गुण हैं तथापि उनमें छह मुख्य
हैं। उन्हीं छह गुणों में से जब वे ‘ज्ञान’ और ‘बल’ का प्रकाशन करते हैं, तब उनका नाम
‘सङ्कर्षण’ होता है। सङ्कर्षण मे अन्य चार गुणों अर्थात् वीर्य, ऐश्वर्य, शक्ति और तेज का
निगूहन होता है, अभाव नहीं।
सङ्कर्षण का वर्ण पद्मराग के समान है। ये नीलाम्बरधारी हैं। ये अपने चार कर
कमलों में क्रमशः हल, मूसल, गदा और अभयमुद्रा धारण करते हैं। ताल इनकी ध्वजा
का लक्षण है। ये जीव के अधिष्ठाता होकर भी ‘ज्ञान’ गुण से शास्त्र का प्रवर्तन करते हैं
और ‘बल’ नामक गुण से जगत् का संहार करते हैं।
३२ सात्त्वतसंहिता
प्रद्युम्न—जब वे ही विष्णु 'वीर्य' और 'ऐश्वर्य' का प्रकाशन करते हैं तब उनका नाम
'प्रद्युम्न' होता है। इनमें ज्ञान, बल, शक्ति और तेज का निगूहन होता है, अभाव नहीं।
प्रद्युम्न का वर्ण रवि किरण के समान है। ये रक्ताम्बरधारी हैं। इनके चार हाथ में
धनुष, बाण, शङ्ख और अभयमुद्रा विद्यमान है। इनकी ध्वजा का चिह्न 'मकर' है। ये
मनस्तत्त्व के अधिष्ठाता होते हुए भी 'वीर्य' नामक गुण से धर्म का प्रवर्तन करते हैं और
'ऐश्वर्य' नामक गुण से जगत् की सृष्टि भी करते हैं।
अनिरुद्ध—जब परब्रह्म परमात्मा 'शक्ति' और 'तेज' का प्रकाशन करते है तब
उनका नाम अनिरुद्ध होता है। इनमें ज्ञान, बल, वीर्य, और ऐश्वर्य का निगूहन होता है,
अभाव नहीं।
अनिरुद्ध का वर्ण नील है। ये शुक्लाम्बरधारी हैं। इनके चार कर कमलों में
खड्ग, खेट, शङ्ख और अभयमुद्रा रहती है। इनकी ध्वजा का चिह्न मृग है। अहंकार के
अधिष्ठाता होते हुए भी ये 'तेज' नामक गुण से आत्मतत्त्व का प्रवर्तन करते हैं और शक्ति
नामक गुण से जगत् का भरण-पोषण भी करते हैं।
परब्रह्म के व्यूहान्तर
इस प्रकार त्रिव्यूह का प्रतिपादन हुआ। कभी-कभी षाड्गुण्य मूर्ति परतत्त्व
श्रीभगवान् विष्णु भी व्यूहों में सम्मिलित होते हैं। उस समय वे 'व्यूह-वासुदेव' के नाम से
अभिहित होते हैं।
ये शशिगौर और पीताम्बरधारी हैं। ये चार कर कमलों में शङ्ख, चक्र, गदा और
अभयमुद्रा धारण करते हैं। इनकी ध्वजा का चिह्न 'गरुड' है। इस प्रकार भगवान् के चार
व्यूह होते हैं।
उपरोक्त व्यूहों के अतिरिक्त अन्य भी व्यूहान्तर हैं।
(१) केशव, नारायण और माधव—ये तीन वासुदेव के विलास हैं। इनमें केशव
स्वर्णाभ हैं और चार चक्र धारण करते हैं। नारायण श्याम वर्ण हैं और चार शङ्ख धारण
करते हैं। माधव इन्द्रनील के समान वर्ण वाले हैं और चार गदाएँ धारण करते हैं।
(२) गोविन्द, विष्णु और मधुसूदन—ये तीन सङ्कर्षण के विलास हैं। गोविन्द चन्द्र
गौर हैं और चार शार्ङ्ग धनुष धारण करते हैं। विष्णु पद्म किञ्जल्क वर्ण हैं और चार हल
धारण करते हैं। मधुसूदन अब्ज वर्ण हैं और चार मूसल धारण करते हैं।
(३) त्रिविक्रम, वामन और श्रीधर—ये तीन प्रद्युम्न के विलास हैं। त्रिविक्रम
अग्निवर्ण हैं और चार शङ्ख धारण करते हैं। वामन बालसूर्याभ हैं और चार वज्र धारण
करते हैं। श्रीधर पुण्डरीक वर्ण हैं और चार पट्टिश धारण करते हैं।
(४) हृषीकेश, पद्मनाभ और दामोदर—ये तीन अनिरुद्ध के विलास हैं। हृषीकेश
तडिदाभ हैं और चार मुद्गर धारण करते हैं। पद्मनाभ सूर्याभ हैं और शङ्ख, चक्र, गदा,
धनुष तथा खड्ग धारण करते हैं। दामोदर इन्द्रगोप वर्षा हैं और चार पाश धारण
करते हैं।
१. प्रथम भाग (परिच्छेद १-६): व्यूह-सिद्धान्त, सृष्टि-क्रम एवं भगवत्-स्वरूप
भूमिका ३३
संक्षेप में हम यह जान लें कि एकपादविभूति में लीला निमित्त रूप धारण किए हुए
परब्रह्म के अनुक्त रूप 'व्यूह' कहलाते हैं। यही पाञ्चरात्र में वर्णित व्यूह का रहस्य है।
सात्वतसंहिता के टीकाकार परम वैष्णव पं० अलशिंग भट्ट
भगवान् यदुगिरि के पदचञ्चरीक पं० अलशिंग भट्ट के पिता मौञ्ज्यायन गोत्रीय श्री
योगानन्द भट्टाचार्य थे, जो नृसिंह के नाम से भी प्रख्यात थे। १ अलशिंग ने मंगलाचरण में
अपने इष्टदेव विहगपति श्रीमन्नारायण का एवं अपने पिता का स्मरण किया है। यदुगिरि
कर्नाटक में है। वर्तमान में यह 'मेलकोटे' नाम से प्रसिद्ध है। इनकी माता का नाम
यदुगिरि नाथ की अम्मण्यम्बा था और पं० नारायण मुनि इनके विद्यागुरु थे। 'वज्र-
मुकुटीविलास चम्पू' नामक एक चम्पूकाव्य की भी इन्होंने रचना की थी। ये अत्यन्त सरस
कवि हैं। महाराज यदुकुल श्रीकृष्णराज सार्वभौम की सभा में पं० अलशिंग को श्वेत छत्र,
चामर, मुक्तामण्डित कुण्डल, सुवर्ण का यज्ञोपवीत तथा कंकण प्रदान किया गया था।
अलशिंग की रचनाएँ
सं० १८३४ (= १७५६ शाकाब्द) में इन्होंने 'सात्वतार्थप्रकाशिका' नामक ईश्वर-
संहिता की व्याख्या को पूर्ण किया था। २ १८३८ ई० में यतिराजशतक और १८३६ ई०
में 'वज्रमुकुटीविलासचम्पू' की रचना की। ३ 'यतिराजविजय व्याख्या' तथा 'सम्प्रदाय-
प्रदीपिका' नामक ग्रन्थ भी इनके द्वारा रचित हैं। ४ इन्होंने २५.६३-९० की टीका में
कन्नड़ भाषा का प्रयोग भी किया है। जैसे त्रिफलोदक के लिए 'नेल्लिकायि अरलेकायि
तारेकायि। वचा बजे।' गोलोमी = पिल्लगरिके, सिंहलोमी = नरियाल्दहुल्लु, महागरुड-
वेगा = गरुडनगरिगिड्डा, कार्कोटा = तोट्टिगिड्डा, वाराहकर्णी = अनेलदालु। बला बेण्णे-
गरुड आदि।
अलशिंग ने सात्वतसंहिता की टीका में ईश्वरसंहिता के अपने व्याख्यान का कुछ
अंश भी प्रस्तुत किया है। ५ (द्र० ६.१८० पर टीका) इन्होंने ईश्वरसंहिता के व्याख्यान के
अतिरिक्त एक 'सात्वतामृतसार' की भी रचना की थी। ६
अलशिंग के भाष्य की मुख्य विशेषता है अनेक ग्रन्थों से उद्धरण लेकर विषय को
१. इति श्रीमौञ्ज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य
तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये ... ।
२. द्र० श्री के०वी स्वामीनाथन् द्वारा सम्पादित पाण्डुलिपि।
३. द्र० न्यू कैटलागस् कैटलोगोरम् भा० १, पृ० ३००।
४. द्र० ६.१६५-१६८ टीका। नाम्ना गोत्रेण मन्त्रपूर्वं तिलोदकं दद्यादिति। अत्रैवं प्रयोगः-
ॐ पुरुषाय नमः, मौञ्ज्यायनगोत्राय नृसिंहशर्मणे पुरुषरूपिणे पित्रे इदं तिलोदकं ददामीति।
५. ननु भवत्कृतेश्वरसंहिता व्याख्याने एव पितृसंविभागः प्रभातिकार्चनमात्रानुष्ठाने होमानन्तर
कार्य इत्युक्तम्, तदसंगतम् , ... संतोष्टव्यमायुष्मता ।। ६.१८० ।।
६. आड्यार पुस्तकालय की सूची। किन्तु गवर्नमेण्ट लाइब्रेरी, मद्रास के अनुसार यह ग्रन्थ
अलशिंग के पिता योगानन्द की कृति है।
सा० सं० - 3
३४ सात्वतसंहिता
सुस्पष्ट करना। इससे भाष्यकार के वैदुष्य का ज्ञान होता है। पाँचरात्र आगम की परमेश्वर
संहिता के व्याख्यान के अतिरिक्त उन्होंने किसी अन्य संहिता के भाष्य का उल्लेख नहीं
किया है।
सात्वत संहिता का विषय विवेचन
पाञ्चरात्र-आगम वैष्णवधर्म के सर्वप्राचीन मतों में से एक है। वैष्णवी शक्ति-
उपासना का विधान पाञ्चरात्र-आगमान्तर्गत 'सात्वतसंहिता' में विशेषरूप से निर्दिष्ट है।
सात्वतसंहिता को नारद मुनि ने भगवान् सङ्कर्षण से प्राप्त किया था और सङ्कर्षण
ने साक्षात् वासुदेव से ग्रहण किया था। यह संहिता पच्चीस परिच्छेदों में आम्नात है।
१. प्रश्नप्रतिवचन नामक प्रथम परिच्छेद में नारद मुनि का मलयाचल पर्वत पर
भगवान् परशुराम से मिलना वर्णित है। परशुराम जी ने नारद जी से कहा—आप में
भवबन्धन को नष्ट करने वाली ऐसी अचला भक्ति है जो सात्वतशास्त्र में प्रतिपादित है।
अतः आप सात्वतशास्त्र में उपदिष्ट क्रियामार्ग अर्थात् अभिगमन, उपादान, इज्या एवं
स्वाध्याय रूप शुद्ध मार्ग में मुनियों को प्रवृत्त कीजिए।
पूर्वकाल में सत्ययुग की समाप्ति एवं त्रेतायुग के आरम्भ में जगद्धाता अच्युत
रक्त वर्ण के हो गए। भगवान् सङ्कर्षण ने इस रक्तता का कारण जगद्धाता अच्युत से
पूछा। भगवान् ने कहा—पहले लोग सत्त्वगुण सम्पन्न थे अब लोग रागपरक हो गए हैं।
अतः मैं भी रागपर होकर रक्तवर्ण का हो गया हूँ। इस पर सङ्कर्षण ने प्रपन्नों के हित के
लिए ब्रह्म का प्रतिपादन करने की उनसे प्रार्थना की। भगवान् ने कहा—वह ब्रह्म १.
ज्ञान, २. ऐश्वर्य, ३. शक्ति, ४. बल, ५. वीर्य एवं तेजोमय होने से षाड्गुण्य विग्रह
वाले हैं। वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध भेद से उन ब्रह्म की व्यूह संज्ञा है।
वह व्यूह ही सत् होने से निःश्रेयस तथा मोक्ष फल देने वाले हैं।
२. तुरीय व्यूहसमाराधन नामक द्वितीय परिच्छेद में सङ्कर्षण ने भगवान् से
पूछा—हे विभो! आपने राग से दूर रहने के लिए उपासना का जो उपदेश दिया
(१.२४) वह 'उपासना' क्या है? श्रीभगवान् ने कहा—एकायन श्रुति के सारभूत
सात्वततन्त्र का मैं उपदेश करूँगा। यह सच्छब्द ब्रह्मशब्द एवं वासुदेव शब्द के अर्चन
करने वाले ब्राह्मणों का लक्ष्यभूत है। ब्राह्मणों का परव्यूह अर्चन में समन्त्रक अधिकार है
और भगवद्भक्त प्रपत्ति निष्ठा वाले क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र इन तीनों का व्यूहार्चन में
अमन्त्रक अधिकार है। दीक्षाग्रहण किए हुए भगवद् भक्त का इस अर्चन में चारों वर्णों का
अधिकार है।
फिर मन्त्रोद्धार एवं चक्ररचना का क्रम वर्णित है। वर्ण चक्र पर वर्णात्मा भगवान्
स्थित हैं। इस वर्ण चक्र की नाभि में अकारादि आठ ह्रस्व स्वर एवं आकारादि आठ
दीर्घस्वर सौर एवं चान्द्र रूप से स्थित हैं। क से लेकर भ तक २४ वर्ण दो-दो के क्रम
से १२ अरा पर स्थित हैं। नेमि भाग में स्वयं काल मकार से हकार तक ९ वर्ण का
कलनात्मक देह धारण किए हुए स्थित हैं। प्रधिगण में क्षकार स्थित है। यह चक्रराट्
विद्या का बीज है और परमात्मा का वाचक है। इसके बाद महामन्त्र का उद्धार कहा गया
भूमिका ३५
है जो अमृत का स्राव करता है और शीघ्र ही मोक्ष प्रदान करता है । छः पदों से युक्त
२२ अक्षरों का मन्त्रोद्धार किया गया है । ये छः पद षाड्गुण्य के वाचक हैं । अङ्गमन्त्र
की सिद्धि के लिए इन छः का हृदयादि छः अङ्गों से योजना क्रम निरूपित है । वैष्णव
साधक बाहरी एवं भीतरी मलों को देह से बाहर निकालकर अर्चन करे ।
अर्चन में पात्रस्थापन की विधि, साधक के शुद्धासन का प्रकार, प्राकृत एवं
तात्त्विक न्यास और मानसिक याग की विधि वर्णित है । भगवान् के मन्त्रमय स्वरूप का
ध्यान और हृतकमल की कर्णिका में सूर्यचन्द्राग्नि रूप शब्दब्रह्म का अर्चन करे । नाद,
बिन्दु, मध्यमा एवं बैखरी इन चार अवस्था वाले शब्दब्रह्म का यजन वाग्भ्रामरी
तैलधारावत् करना चाहिए । फिर उन शङ्खचक्र के चिह्नों वाले शब्दब्रह्म का ध्यान वर्णित
है । अन्त में निर्विकार भगवान् की मानसी पूजा के लिए उपयुक्त अर्ध्यादि की भावनावश
गङ्गावतरण का विधान है । इस प्रकार जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति एवं तुर्याख्य पद चतुष्टय पर
स्थित भगवान् वासुदेव को मानसी पूजा से प्रसन्न कर ॐ ॐ दो बार कह कर 'प्रीयतां
मे प्रभु' ऐसा कहे । यही तुरीयव्यूहसमाराधन है ।
३. सुषुप्ति व्यूहसमाराधन नामक तृतीय परिच्छेद में सुषुप्ति पदाश्रित
व्यूहात्मक भगवान् के स्वरूप की विवेचना प्रस्तुत है । साधक ब्रह्मामृतमय योग से स्थिर
चित्त हो यजन करे क्योंकि दो-दो गुणों से ही सङ्कर्षणादि मूर्तिमय हैं फिर भी उनमें शेष
चार गुण भी अनुवृत्ति रूप से रहते हैं । इस प्रकार मूर्तिमय में दो-दो गुण व्यक्त रूप से
तथा अवशिष्ट चार गुण अव्यक्त रूप से रहते हैं । ब्रह्मषाड्गुण्य के वाचक मन्त्र चतुष्क
साधक भक्त को सतत मोक्ष प्रदान करने वाले कहे गए हैं । इन चारों मन्त्रों का उद्धार कर
उनके पदों की संख्या भी वर्णित है ।
यहाँ पर विचार करना चाहिये कि सात्त्वत संहिता के द्वितीय परिच्छेद में तूर्यव्यूह
का एक ही मन्त्र उद्धृत किया गया है जबकि सुषुप्ति, स्वप्न तथा जाग्रत इन तीन व्यूहों
में चार-चार मन्त्र उद्धृत किये गये हैं उसके अनुरोध से तूर्यव्यूह में भी चार मन्त्र का
उद्धार अपेक्षित है । जबकि न केवल भाष्य में अपितु संहिता में भी चातुरात्म्य चतुष्ट्य
का प्रतिपादन किया गया है । जब तूर्यव्यूह में भी चातुरात्म्य भासित हो रहा है तब वहाँ
भी चार मन्त्र होना चाहिए यह स्वाभाविकी शङ्का उत्पन्न होती है । तब इसका परिहार इस
प्रकार करना चाहिये—द्वितीय परिच्छेद में पर स्वरूप का विवरण मात्र है । किन्तु तृतीय,
चतुर्थ एवं पञ्चम परिच्छेद में सुषुप्ति, स्वप्न एवं जाग्रत्पद में स्थित व्यूह स्वरूपों का
वर्णन है । इस व्यूहजन्य ब्रह्म को चातुरात्म्य पद से भी कहा जाता है । यह चातुरात्म्य
परस्वरूप में अव्यक्तदशा में रहता है । इसलिये वहाँ भी चातुरात्म्य प्रयोग होता है । उसे
तुर्यव्यूह नाम से भी कहा जाता है—यहाँ नित्योदित दशा तथा शान्तोदित दशा दो प्रकार
की दशा स्वीकार की जाती है । नित्योदित दशा परात्पर वासुदेव दशा तथा शान्तोदित
दशा पर वासुदेव दशा कही जाती है । किन्तु दोनों दशा में वासुदेव का प्राधान्य रहता
है । उस अवस्था में सङ्कर्षणादि तीनों का तथा अच्युतादि तीन का अव्यक्त रूप से
अवस्थान रहता है । प्रकृति में आदिमूर्ति वासुदेव का ही प्राधान्य प्रदर्शित करने के कारण
३६ सात्वतसंहिता
तुर्यव्यूहापर नामक परस्वरूप के आराधन के लिये यहाँ एक ही मन्त्र का निर्देश किया
गया है ।
४. स्वप्नव्यूहसमाराधन नामक चतुर्थ परिच्छेद में स्वप्न में परमात्मा को
जीवात्मा के समान (मातृका) वर्ण कमल के ऊपर प्रकाशित होता हुआ बताया गया है ।
यहाँ सर्वप्रथम वासुदेवादि चार व्यूहों के मूलभूत विशाखयूप संज्ञक भगवान् का लक्षण
प्रतिपादित है । षाड्गुण्य विभव वाले तेजःस्वरूप विशाखयूप भगवान् का कर्णिका के
अग्रभाग में अवलम्बन कर मन्त्रमय देह की मूर्ति का दर्शन करे । फिर उस मन्त्रमय शरीर
का उपसंहार करे क्योंकि वह तेजःस्वरूप विशाखयूप भगवान् ब्रह्मयूप शरीर से विद्यमान
हो जाते हैं । अतः उन सर्वव्यापक विभु के वासुदेवादि शाखाएँ हैं इसलिए उन्हें
विशाखयूप कहा जाता है । फिर इन विशाखयूप भगवान् का लक्षण बताया गया है ।
फिर अन्त में विभिन्न शरीर वाले विशाखयूप संज्ञक देव के विद्या एवं विवेक प्रदान करने
वाले चार महामन्त्र का उद्धार किया गया है । द्वितीय परिच्छेद में 'प्रीयतां मे परः प्रभुः'
यह प्रीति मन्त्र कहा गया । किन्तु यहाँ 'पर' के स्थान में दो प्रणव लगाकर वासुदेव,
सङ्कर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध का प्रयोग करना चाहिए जैसे 'ॐ ॐ वासुदेवः प्रीयताम्'
इत्यादि ।
५. जाग्रद्व्यूह समाराधन नामक पञ्चम परिच्छेद में सङ्कर्षण के जाग्रल्लक्षण
व्यूह का विवेचन है । वस्तुतः हृदयकमलाकाश 'तुर्य' पद है और उसका कर्णिका स्थान
'सुषुप्ति पद' है । केशर 'स्वप्न' पद है; उसके नीचे स्थित पत्र-स्थान 'जाग्रत्' पद है ।
इस हृदय रूप वर्ण कमल में जाग्रत् संज्ञक अब्ज पत्र में जाग्रत् नामक व्यूह है । यहीं पर
ॐ प्रणव सहित ब्रह्मबीज चतुष्टय शं षं सं हं रूप से चारों दिशाओं में उदीयमान
वासुदेवादि मूर्तियों का दर्शन करना चाहिए । यह मूर्ति स्वप्न व्यूह की अपेक्षा 'जाग्रत् '
होने के कारण अधिक सुव्यक्त है ।
फिर वासुदेवादि के विशेष एवं मान्य लक्षणों को कहकर जाग्रद्व्यूहमन्त्र चतुष्टय
का उद्धार किया गया है । जाग्रद्व्यूह का लक्षण युग भेद से अलग-अलग भी बताया
गया है । साधक कब और कहाँ स्मरण करे यह वर्णित है । सृष्टि क्रम से तथा संहार क्रम
से भगवान् का स्मरण परम गति को प्रदान करने वाला कहा गया है । अर्चन के लिए
भगवान् के विभवावतारों का क्रम वर्णित है । इस प्रकार परमात्मा विष्णु के अन्तर्याग का
विधान संक्षेप से प्रस्तुत किया गया है । अब 'बहिर्याग' का उपक्रम वर्णित है ।
६. चातुरात्म्यबाह्याराधन नामक षष्ठ परिच्छेद में बाह्यसाधनभूत द्रव्ययाग (=
बहिर्याग) का वर्णन है । इसके लिए सबसे पहले भद्रपीठ के शोधन का विधान है ।
तुलसी पत्रादि सभी पूजा द्रव्य पहले इकट्ठा कर भद्रपीठ को झाड़-पोंछ कर वस्त्र से छाने
हुए जल से प्रणव सम्पुटित द्वादशाक्षर मन्त्र से भद्रपीठ का प्रक्षालन करे ।
फिर चक्रराजार्चन का विधान है । 'ॐ चक्रराजाय नमः' से विभिन्न उपचारों द्वारा
चक्रराज का पूजन करे । आधारपीठ पर उन्हें सर्वौषधि-आदि विभिन्न पूजा सामग्रियों द्वारा
कलश के बाहर कोणों पर स्थापित करे । आठ कलशों की स्थापना बहिर्याग में कही गई
भूमिका ३७
है । इसके बाद बिम्बशोधन करना चाहिए । फिर आवाहन का क्रम वर्णित है । वेदी,
कुम्भ एवं मण्डल पर आवाहित देवों के उपचारों के समर्पण का प्रकार बताया गया है ।
आसनादि उपचारों के समर्पण का प्रकार बताया गया है । फिर क्षीरादि २५ कलशों के
स्नपन का प्रकार वर्णित है । इसके बाद नीराजन विधि कही गई है । भगवान् को नया
वस्त्र निवेदित करे । उपचारों के बाद आकाश से आते हुए भगवद्बिम्ब का ध्यान करे ।
गन्धोदक से चार कलशों को पूर्ण करे । फिर अलङ्कार आसन का समर्पण कहते हैं ।
फिर भोज्यासन उपचार का वर्णन है । इसके बाद मुद्राबन्धलक्षण, जप का विधान और
जप के बाद पुनः भगवदर्चन कहा गया है ।
कुण्ड के चारों ओर आठ पूर्ण कुम्भ का स्थापन करना चाहिए । अग्नि का
आनयन और अपने हृदयस्थित तेज का उस अग्नि में स्थापन करे । कुण्ड में
अग्निस्थापन, फिर उसके प्रज्वलन के लिए चार समित्रक्षेप करे । इस प्रकार परिस्तरण
के बाद होमोपकरण का सन्निधापन वर्णित है । प्रणीतासंस्कार, इध्मप्रक्षेपण,
आज्यसंस्कार, स्रुक्स्रुवसंस्कार, पवित्रधारण, आधाराधेय विवरण एवं अग्निमध्य में
भगवद् आवाहन करे । विधिज्ञ ब्राह्मण को सव्यभिचार मौन (= संकेत युक्त) वर्जित
करना चाहिए । शुभ और व्यभिचार रहित मौन धारणकर क्रिया पर होना चाहिए । अन्त
में अनुयाग विधि का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है ।
७. अमन्त्रकविधि नामक सातवें परिच्छेद में उस पुण्यावह कर्म का निरूपण है
जो भक्त के पाप समूह को जला देता है । जिस प्रकार जाग्रद् व्यूह वासुदेवादि चतुष्टय में
पहले जैसा वर्णभेद कहा गया है, केशवादि त्रिक चतुष्टय में भी उसी प्रकार का वर्णभेद
विद्यमान रहता है । केशवादि से रूप का आश्रय लेकर साधक दान एवं धर्म के आचरण
से शीघ्र परं धाम को प्राप्त कर लेता है ।
वासुदेवादि तथा केशवादि को प्रसन्न करने के लिए व्रतानुष्ठान का क्रम कहा गया
है । कार्तिक मास में दशमी तिथि को सायंकाल व्रत का संकल्प करे ओर एकादशी को
व्रत करने का विधान है । इसमें वासुदेव का सलाञ्छन ध्यान विहित है । द्वादशी को
चतुरात्मा प्रभु की पूजा कर पारण करे । यहीं पर 'जितन्ता' मन्त्र चतुष्टय स्तोत्र कहा गया
है । चातुरात्म्य की आराधना में वर्णों का क्रम भी बताया गया है ।
सङ्कर्षणादि का लाञ्छन से युक्त ध्यान कहा गया है । फिर मात्र मुमुक्षु के लिए
अनुष्ठेय व्रत की विधि वर्णित है । निष्काम व्रत करने वाले के लिए और सकाम व्रत
करने वाले साधक के लिए अलग-अलग दान का विधान् है । शूद्रों के लिए व्रत कर्म में
दान में असिद्ध अन्न देने का विधान है ।
द्वादशवार्षिक व्रत का विधान और व्रतान्तर का भी निरूपण किया गया है ।
द्वादशाख्य व्रत का विशेष विधान किया गया है । बारह मासों में केशवादि द्वादश मूर्तियों
का अर्चन किया जाता है । फिर दो संवत्सर पर्यन्त चलने वाले व्रत का विधान है ।
इसमें केशवादि द्वादश और वासुदेवादि चार कुल सोलह मूर्तियों का अर्चन होता है ।
फिर व्रत करने वाले साधक के लिए भोज्य पदार्थ देने का विवेचन प्रस्तुत है ।
३८ सात्त्वतसंहिता
पुनः व्रतान्तर का विधान है, जिसमें ११ मासेशों का यजन कर द्वादशी में उपवास करने
का विधान है । यहीं पर भिक्षा में प्राप्त द्रव्य का विशेष विचार प्रस्तुत किया गया है ।
फिर दिव्यायतन एवं सिद्धायतन का लक्षण कहा गया है । जहाँ अपनी अभीष्ट प्राप्ति के
लिए ब्राह्मणादिकों ने भगवद् बिम्ब की स्थापना की हो वह मानुषायतन है ।
अन्त में वैष्णवक्षेत्र का प्रमाण बताया गया है । जहाँ तक शङ्खध्वनि या घण्टे की
ध्वनि जाए वह वैष्णव क्षेत्र होता है । सालोक्यादि मोक्ष का विचार कर वैष्णव क्षेत्र में
जाने से मनःशुद्धि होती है । व्रत करने में विघ्न तो आएँगे ही । अतः उनसे भयभीत नहीं
होना चाहिए क्योंकि भगवान् ही उस व्रत को समाप्ति पर्यन्त अमृत से सींचते रहते हैं ।
८. समन्त्रक व्रतविधि नामक अष्टम परिच्छेद में चातुरात्म्यार्चन और अङ्ग
मन्त्रार्चन का विधान है । समन्त्रक व्रत मात्र ब्राह्मणों के लिए ही विहित है । यहीं पर
वासुदेवादि के बीजों का विधान है । वासुदेवादि मूर्तियों का ध्यान, उनके अङ्गमन्त्र, बीज
मन्त्र तथा केशवादि द्वादश के बीज का विधान है ।
फिर केशवादि देवियों के द्वादश बीज का कथन है । फिर सर्वमन्त्र धारणाञ्जलि
मुद्रा का कथन है । व्रत में बिम्ब के विधान के प्रसङ्ग में ही कुण्ड का लक्षण कहा गया
है । केशवादि द्वादशात्मा विभु की पूजा के लिए मार्गशीर्ष मास से आरम्भ करके कौमुद
मास पर्यन्त व्रताचरण का विधान किया गया है । एकादशी के दिन तीनों कालों में
केशवादि की पूजा करे । इसके बाद केशवादि हाथों में विराजमान आयुधों का विस्तृत
वर्णन है । फिर केशवादि पत्नियों की उत्पत्ति का क्रम कहा गया है । उन द्वादश देवियों
के लाञ्छन चिह्नों को बताया गया है ।
फिर स्नपन द्रव्य का विधान कर गुर्वर्र्चन एवं नारायण के अर्चन का विधान कहा
है । इसी सम्बन्ध में द्वादशी का भी निर्णय विचार प्रस्तुत है । चतुर्मास्य का विधान कर
यह परिच्छेद पूर्ण हो जाता है ।
९. विभवदेवतान्तर्यागविधि नामक नवम परिच्छेद में स्थूलसूक्ष्मपरत्वभेद से
विभवावतारों के त्रैविध्य का वर्णन है । विष्णु का स्थूल एवं कामरूपधृक् स्वरूप समस्त
लोक का कल्याण करने वाला है । वह लीला करने के लिए समस्त अस्त्रों को धारण
करते हैं । उनका स्वरूप स्वप्न सुषुप्ति पद में सुव्यक्त रहता है तथा तुर्य पद में शान्त
रहता है । तेजोमय जो रूप है वही 'वैभव' शान्त संज्ञक है । इनके वाचक १. संज्ञा, २.
पद, ३. पिण्ड तथा ४. बीज भेद से चार कहे गए हैं । इनमें दो को लेकर साधक
आराधना करे ।
१०. विभवदेवता बहिर्याग विधि नामक दसवें परिच्छेद में जल के मध्य में
विभव देवताओं का अर्चन कहा गया है । विशाख यूप बीज नम् से न्यास किया जाता
है । फिर मण्डल में ध्रुवादि देवों के स्थान बताए गए हैं । मध्य में पद्मनाभ का पूजन
होता है । फिर अग्नि के मध्य इनका सन्तर्पण किया जाता है । फिर वैभव मुद्रा का
लक्षण बतलाया गया है । यह मुद्रा विभव देवताओं की साधारणी मुद्रा है । इससे सभी
सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । बाह्य अर्चन में शारीरिक मुद्रा बन्धन होता है और मानसिक
अर्चन में मानसिक रूप से मुद्रा बन्धन होता है । इससे साधक के बाह्य एवं आभ्यन्तर
पाप नष्ट हो जाते हैं तथा मन में प्रसन्नता होती है । अन्त में मण्डल स्थित देवताओं का
उपसंहार क्रम वर्णित है ।
११. मण्डलकुण्ड लक्षण नामक ग्यारहवें परिच्छेद में मण्डल निर्माण की
विधि एवं ध्यान का लक्षण बताकर पाँच प्रकार के कुण्डों का लक्षण वर्णित है ।
१२. विभवदेवताध्यान नामक बारहवें परिच्छेद में अलग-अलग विभव
देवताओं का ध्यान वर्णित है । १. शक्तीश, २. मधुसूदन, ३. विद्याधिदेव, ४. कपिल,
५. विश्वरूप, ६. हंस, ७. वाराह, ८. वडवानल, ९. धर्म, १०. हयग्रीव, ११.
एकार्णवशायी, १२. कूर्म, १३. वराह (यज्ञ), १४. नृसिंह, १५. अमृतातहरण, १६.
श्रीपति, १७. कान्तात्मा, १८. राहुजित्, १९. कालनेमिघ्न, २०. पारिजातहर, २१.
लोकनाथ, २२. दत्तात्रेय, २३. न्यग्रोधशायी, २४. मत्स्यावतार, २५. वामन, २६.
त्रिविक्रम, २७. नर, २८. नारायण, २९. हरि, ३०. कृष्ण, ३१. परशुराम, ३२.
श्रीराम, ३३. वेदव्यास, ३४. कल्कि, एवं ३५. पातालशयन—इन विभव देवताओं का
अलग-अलग विस्तृत ध्यान बताया गया है । फिर सत्य, सुपर्ण, गरुड़ तार्क्ष्य और
विहगेश्वर इन भगवन्मय वाहन का ध्यान वर्णित है । ये सभी पञ्चप्राण के विकार हैं ।
अतः चरण से लेकर इनका समस्त देह पुरुषाकृति है । नारायण पक्षी के पक्ष रूपी कमल
के विष्टर पर आसीन हैं । इस प्रकार गरुड़वाहन विष्णु का ध्यान सिद्धि के लिए किया
जाता है । इनके छः भुजाओं में एवं आठ भुजाओं आदि से लेकर अष्टादश भुजाओं में
स्थित आयुध का वर्णन है ।
१३. भूषणाद्यस्त्रदेवता ध्यान नामक तेरहवें अध्याय में किरीट आदि भगवान्
के भूषणभूत चिह्नों का स्वतन्त्र रूप से अर्चन कहा गया है । इसी सन्दर्भ में किरीट का
स्वरूप, श्रीवत्स का लक्षण एवं वनमाला का ध्यान कहकर चक्रादि सप्तदश आयुधों का
ध्यान बताया गया है । ये सत्रह आयुध चक्र, कमल, गदा, शङ्ख, हल, मुशल, इषु,
धनुष, नन्दक, खेटक, दण्ड, परशु, पाश, अङ्कुश, मुद्गर, वज्र और सौदामिनी हैं । इन
सभी का सामान्य लक्षण कहकर किरीटादि के अधिष्ठातृ देवताओं का निरूपण है । फिर
परमात्मा विभु के साधार और निराधार जो चिन्ता आदि सुन्दरियाँ कही गई हैं उनका
ध्यान वर्णित है । इनके अतिरिक्त भगवान् के शयनागार में चार शक्तियाँ और हैं। इसके
अलावा भगवान् की तीन शक्तियाँ और हैं जो तीन दिशाओं में भगवान् का पद संवहन
करती हैं । इनमें एक लक्ष्मी हैं जो कभी वाम भाग में रहती हैं और कभी दक्षिण भाग में
रहती हैं । श्री एवं पुष्टि दाएँ-बाएँ निवास करती हैं । इन्हीं दो शक्तियों का परिणाम
चिन्ता, कीर्ति, दया, जया तथा माया आदि रूपों से अनेक प्रकार का कहा गया है ।
फिर इनके लक्षण कहकर शुद्ध्यादि देवियों के लक्षण, शक्त्याष्टक लक्षण एवं लक्ष्मी
आदि बारह देवियों के सामान्य लक्षण कहकर इनके अर्चन के फल का कथन है ।
१४. पवित्रारोपणविधि नामक चौदहवें अध्याय में नित्य-नैमित्तिक कर्म में
बाधा निवारणार्थ पवित्रारोपण कर्म कहा गया है । नित्य-नैमित्तिक कर्म का लोप न हो,
४० सात्त्वतसंहिता
औपचारिकता के अभाव में दोष न पड़े आदि से निवृत्ति का यह उपाय बताया गया है।
आराधना में सांस्पर्शिक दोष (स्रक्, चन्दन आदि का अभाव) पूजा करने में
मात्रावित्त (अर्थात् हिरण्य सहित शालि, तण्डुल तिलादि का दान) से पूर्ण होता है।
आभ्यवहारिक भोगों के लोप का दोष आज्य परिप्लुत अन्न के होम से परिपूर्ण होता है।
छत्र, चामरादि के अभाव से उत्पन्न औपचारिक दोष का शमन मुद्गादि विविध बीज के
दान से होता है। कृच्छ्रचान्द्रायण व्रतों में होने वाले दोषों का शमन चातुर्मास्य के संयम
से होता है।
इसी सन्दर्भ में पवित्रारोपण का काल बताया गया है। आषाढ़ की पूर्णिमा से
कार्तिक पूर्णिमा तक का दिन चातुर्मास्य कहा जाता है। यही वेदाध्ययन (पवित्रारोपण)
का काल है। पवित्रानुष्ठान दशमी एवं एकादशी को भी किया जाता है। इसमें देवेश का
आवाहन कर अर्घ आदि देकर प्रार्थना करे। आप भगवन् आनन्दभोग से तृप्त हैं,
आपकी भक्ति से तृप्त हुआ मैं अपनी सिद्धि की कामना से आपका यजन करता हूँ।
१५. पवित्रस्नानविधि नामक पन्द्रहवें परिच्छेद में सर्वाच्छिद्रपूरक पवित्रारोपण
कर्म के बाद सम्पूर्ण याग की छिद्र पूर्ति हेतु समुद्रगामिनी नदी में स्नान करना वर्णित है।
फिर कुश कूर्च के निर्माण का प्रकार कहा गया है। पचीस काण्ड कुश में भगवद् भावना
से मन, बुद्धि आदि विभिन्न तत्त्वों की आराधना कर शेष बचे हुए कुशों को एक में
मिलाकर गोले के समान बाँध देवे। दर्भ से पवित्री निर्माण करे। उसमें मन्त्रनाथ का
ध्यान कर मन्त्रनाथ की प्रतिष्ठा करे। फिर अर्घ्य एवं पुष्पादि से पूजा कर प्रार्थना करे।
फिर विधिपूर्वक स्नान करे।
उस पवित्रक में अविनाशी सच्चिन्मय ऐश्वर स्वरूप वाले जीव रूप हंस की
भावना करे। इस प्रकार ध्यान कर उस हंस रूप पवित्रक को जल में स्नान कराए और
फिर अन्यों को भी अनेक लोगों के साथ स्नान कराए। इस प्रकार भगवान् के स्नानान्तर
के पश्चात् उन्हें विष्टर प्रदान कर, रथ निर्माण कर एवं अर्चन कर यात्रोत्सव आरम्भ करे।
१६. अघशान्तिकल्प नामक षोडश परिच्छेद में ब्राह्मणादि वर्णों के
सर्वसिद्धिप्रद तीन प्रकार के दीक्षा के उपायों को बताया गया है। पहले शिष्य को
गुरुकुल में रखते हैं। फिर प्रायश्चित्त एवं शान्त्यादि कर्म उस शिष्य के पापादि नाश हेतु
कराते हैं। फिर ब्रह्मकूर्च सहित प्रायश्चित्त कराते हैं। दोषों के प्रायश्चित्त से वह शिष्य
नवीन एवं निर्मल हो जाता है। इससे कृतघ्न एवं नास्तिक शिष्य भी दोषमुक्त हो जाता
है। जो पाप के अनुताप से आर्त होकर भगवान् के शरणागत हो जाता है उसके बारे में
कहना ही क्या?
सङ्कर्षण ने पूछा—किन चिन्हो से पता लगता है कि पाप नष्ट हो गए? भगवान्
ने कहा—आराधक के ऊपर आराधन मन्त्र का जब प्रभाव होता है तो साधक का चित्त
अभूतपूर्व प्रसन्नता से भर जाता है, उसके तेज की अभिवृद्धि हो जाती है। उसमें धैर्य,
उत्साह, सन्तोष तथा अदैन्य एवं अकार्पण्य गुण उत्पन्न हो जाते हैं।
भूमिका ४१
शिष्य परीक्षित हो जाने पर गुरु से परव्यूह एवं विभवादि (षाड्गुण्य) तीनों दीक्षा
की प्रार्थना करे ।
१७. वैभवीयनृसिंहकल्प नामक सप्तदश परिच्छेद में नृसिंह मन्त्र का कथन
है । 'ॐ नमो भगवते नारसिंहाय' इस द्वादशाक्षरमन्त्र से विग्रहवत् उनकी पूजा करने का
विधान है । इस मन्त्र से दीक्षित साधक अधिकार प्राप्त होने पर भगवद् आराधन करे ।
प्राणायाम का प्रकार, भूतशुद्धि का प्रकार, करन्यास, अङ्गन्यास तथा भूष्णायुध
शक्तिन्यास कहते हैं । फिर शिष्य अपने में देवता भाव की भावना करे ।
पूजा के लिए मण्डलरचनाविधान, पीठपरिकल्पना तथा महाकुम्भ स्थापन की
विधि वर्णित है । प्रथम गणेश की पूजा, फिर कलश में मन्त्रनाथ का आवाहन पूजन
करे । भोग याग का विधान कर मूल मन्त्रादि का ध्यान कहा गया है । फिर हन्मुद्रा,
शिरोमन्त्रादि मुद्रा-पञ्चक एवं श्रियादि शक्तिमुद्रा-चतुष्टय का विधान है । फिर अर्घ्यादि
देकर मन्त्र देवता को पूर्णाहुति प्रदान करे ।
फिर गुरु उन शिष्यों को वैष्णव धर्म के नियमों को सुनाए । भगवान् से क्षमा
प्रार्थना के बाद विश्वक्सेनार्चन की विधि बताई गई है । यहाँ आत्मसिद्धि के लिए
आगमशास्त्र के अनुसार नृसिंहानुष्ठान के ज्ञाताओं से समझ बूझ कर विधि कही गई है ।
फिर शान्तिकादि कर्म का विधान किया गया है । पौष्टिक कर्म का प्रतिपादन कर
आप्यायन विधि का निरूपण किया गया है । फिर संवर्धन विधि कहकर रोगार्तों के लिए
रक्षाविधान कहा गया है । क्रियापरायण आस्तिक भक्तों एवं अपने हितेच्छु जनों की भी
रक्षा करनी चाहिए । इसकी प्रयोग विधि श्रीनृसिंहबीज गर्भ में प्रणव सम्पुटित साध्यनाम
लिखकर बताई गई है । यन्त्र का निर्माण प्रकार भी उल्लिखित है । फिर
धर्मार्थकाममोक्षाख्य पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि के लिए मन्त्रराज की उपासना विधि का
निरूपण है ।
१८. अधिवासदीक्षाविधि नामक अठ्ठारहवें परिच्छेद में द्विजातियों के तीनों
दीक्षाक्रमों को बताया गया है । दीक्षामण्डपनिर्माण की विधि में पञ्च महाभूतों को बलि
देकर, गायों को संतृप्त कर, ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर सर्वाभरणभूषित मण्डप निर्माण
करने को कहा गया है । एकान्त में गवाक्ष युक्त हवन मण्डप बनावे । सभी स्थानों पर
सर्वदा बलिदान की विधि कही गई है । फिर पूजा के लिए विभिन्न द्रव्यों का सम्भारार्जन
करे । दीक्षा में प्रविष्ट होने वाले भक्तों की संख्या के अनुसार पूजा द्रव्य घटा बढ़ा लेना
चाहिए । जब समस्त वैभव मन्त्र की एक साथ दीक्षा देनी हो तब समस्त विभव देवों के
कारणभूत विशाखयूप मन्त्र से दहन एवं आप्यायनानुष्ठान कर्म करे ।
फिर यागगृह की शोभा के लिए अलङ्करण करे । फिर अर्घ्यादि की परिकल्पना
का क्रम कहा है । प्रथमतः चार घटों में विभिन्न द्रव्यों को रखने का विधान है । फिर
द्वितीय अर्घ्यपात्र का विनियोग आदि विवक्षित है । फिर कुम्भ मण्डलाग्नियों में
भगवदर्चन का क्रम कहा गया है । फिर क्षेत्रनाथ की बलि, हवि पाक विधान, द्रव्यसम्पात
होम तथा पूर्णाहुति करे ।
४२ सात्त्वतसंहिता
१९. दीक्षाविधि नामक उन्नीसवें परिच्छेद में दीक्षा का विधान है । तीन प्रकार
की दीक्षा होती है । १. जो कैवल्य मुक्ति रूप फल प्रदान करे, २. जो दीक्षा भोग एवं
कैवल्य दोनों प्रदान करे और ३. जो केवल भोग प्रदान करे । शिष्य के स्वप्न की परीक्षा
करके गुरु दीक्षा देवे । इसी सन्दर्भ में शुभाशुभस्वप्नों का विवेचन प्रस्तुत है । अशुभ
स्वप्न की शान्ति के अनन्तर कुम्भादि अर्चन क्रम आरम्भ करे । फिर शिष्य का वैष्णव
नामकरण करे । शिष्य, मण्डल, कलश तथा गुरु को नमस्कार कर निर्दोषता के लिए
भूतशुद्धि करे । शिष्य बिम्ब के अग्रभाग में पुष्पाञ्जलि समर्पण करे । सहस्र संख्या में
मूलमन्त्र से प्रायश्चित्त होम कर शिष्य शिर से पैर तक सूत्र से अपने को नापकर सूत्र
प्रसारण कर्म करे । फिर शिष्य में, भगवान् में, सूत्र में तथा अपने में अकस्मात् अध्वा
का दर्शन करे । अध्वस्मरण करके आहुतियाँ प्रदान करे । फिर पृथ्व्यादि तत्त्वों का
सन्तर्पण करे ।
फिर शिष्य के चैतन्य का अपने हृदय में सङ्कर्षण करे । फिर शिष्य के लिए
भुवनाध्वादि का उपदेश करे । क्ष्मा तत्त्व का विज्ञापन, अप्तत्त्व का संस्कार करके जल
देवता से प्रार्थना करे कि मुझमें रस तन्मात्रा विद्यमान रहे ।
इसी प्रकार तेजस्तत्त्व से लेकर मनस्तत्त्वान्त का तथा मन्त्राध्वा से लेकर वर्णाध्वा
पर्यन्त चारों का संस्कार करे । फिर ऐश्वरबीज के द्वारा जप एवं ध्यान लक्षण समाधि में
लीन होकर द्वैत मात्र का अनुभव करे । फिर समाधि की सिद्धि हेतु आचार्य सौ आहुति
प्रदान करे । 'व्यूह दीक्षा' एवं 'ब्रह्म दीक्षा' इन दोनों का केवल मोक्ष के अतिरिक्त और
कोई फल नहीं है ।
२०. अभिषेक विधि नामक बीसवें अध्याय में दीक्षा के अनन्तर शीघ्र ही
शिष्य का अभिषेक वर्णित है । सभी मन्त्रों की सिद्धि के लिए तथा सभी मन्त्रों पर
अधिकार प्राप्ति के लिए अभिषेक होता है । अन्त में गुरुयाग का विधान है ।
२१. समयविधि नामक इक्कीसवें अध्याय में शिष्य के लिए विभिन्न आचारों
का निर्देश है । वैष्णवधर्म परायणों का विष्णुवत् पूजन करे । पुष्प आदि का आहरण
स्वयं अस्त्रमन्त्र से अपनी वाटिका से करे । फिर पूजा द्रव्यों का ग्राह्याग्राह्यत्व कहा गया
है । कांस्य पात्र में भोजन न करे । कांसे में अर्घ भी न दे । अवैष्णव से कभी भी सम्बन्ध
न रखे । चातुर्मास्य व्रत के अनुष्ठान का स्थान पुण्यक्षेत्र होना चाहिए । समय पञ्चक के
यथावत् परिपालन से अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है और सुप्रसन्न मन से यथावत् कालुष्य
रहित होकर साधक आनन्द समुद्र में स्नान करता है तथा उसकी आत्मा सदैव प्रसन्न
रहती है ।
२२. अधिकारिमुद्राभेदविधि नामक बाइसवें परिच्छेद में सामयिक, साधक,
पुत्रक और आचार्य चारों प्रकार के शिष्यों के लक्षण कहे गए हैं ।
२३. अधिवासदीक्षाविधि नामक तेइसवें परिच्छेद में पद्मनाभ एवं ध्रुवादि
विभव देवताओं के पिण्डमन्त्रगणों को कहा गया है । फिर किरीटादि १७ लाञ्छन मन्त्रों
का उद्धार किया गया है ।
भूमिका ४३
२४. प्रतिमापीठप्रासादलक्षण नामक चौबीसवें परिच्छेद में प्रतिमा निर्माण के
लिए शिला का चयन एवं बिम्ब के पाँच भेद बताए गए हैं। चित्र, मिट्टी, काष्ठ, शिला
एवं लोहे के भेद से पाँच प्रकार के बिम्ब कहे गए हैं। बिम्ब निर्माण के लिए द्रव्य
सामग्री का विवेचन कर भित्ति पर चित्र निर्माण अनर्थकारी बताया गया है। बिम्ब बनाने
के लिए विभिन्न मान (नाप) बताई गई है। आँख, कान, नाक आदि की नाप यव से
बताई गई है। एक अङ्गुल का आठवाँ भाग 'यव' कहलाता है।
हयग्रीव बिम्ब के मुख का लक्षण, श्रीनृसिंह वक्त्र का लक्षण, वराहवक्त्र का
लक्षण, सत्य सुपर्णादि गरुड़व्यूह का लक्षण, वामनलक्षण तथा पीठलक्षण का कथन
किया गया है।
एक पीठ के ही चार भेद होते हैं जो केवल लक्ष्म (चिह्न) से वर्जित होते हैं।
फिर जब चिह्न आ जाता है तो वे ही अनेक हो जाते हैं। इस प्रकार सर्वसामान्य पीठों
की संख्या सोलह कही गई है।
बिम्ब के लिए ग्रहण किए जाने वाले भूखण्ड को जल प्रतिग्रह करे। मन्दिर पर
कलश उत्कृष्ट धातु के होने चाहिए। घटों को नेत्र एवं वस्त्र से वेष्टित करे फिर
ऋग्वेदियों से एवं सामवेदियों से विभिन्न मन्त्रों का पाठ कराकर उसकी प्रतिष्ठा करे।
इसके बाद प्रासादलक्षण का निरूपण है। वह प्रासाद देवगृह के गर्भ में एक
ताल से अधिक अथवा न्यून मान में द्वादश हाथ का होना चाहिए। ऐसा प्रासाद
कल्याणकारी होता है। मन्दिर की ऊँचाई क्षेत्र का तिगुना निर्माण करे अथवा डेढ़ गुना
रखे या दुगुना रखे। द्वारों की ऊँचाई गर्भ से दूनी बनावे। इस प्रकार के प्रासाद का नाम
अनन्त भुवन है। सलक्षण बिम्ब मान हयग्रीवमुख लक्षण, नृसिंहमुख लक्षण, वराहमुख
लक्षण, हयग्रीवादि के तीन चार और पञ्चमुख लक्षणों को विष्णुधर्मोत्तर पुराण तथा
हेमाद्रि कृत चतुर्वर्ग चिन्तामणि में व्रतभाग प्रथम खण्ड में देखना चाहिए।
२५. प्रतिष्ठाविधि नामक पच्चीसवें परिच्छेद में मूर्ति प्रतिष्ठा वर्णित है।
चतुर्द्वार मण्डप के निर्माण का विधान करके वेदी निर्माण की विधि बताई गई है। वेदी में
'मण्डलादि-स्थल' का विभाग क्रम कहा गया है। फिर आठ कुण्डों के निर्माण का प्रकार
उल्लिखित है। मण्डप की ऊँचाई और स्नान गृह का विस्तार वर्णन करके बालुकापीठ
के मान का निरूपण किया गया है। स्नानार्थ शाला निर्माण के नियम का निरूपण कर
नेत्रोन्मीलन गृह का लक्षण कहते हैं। द्वार एवं तोरण लक्षण में चारों दिशाओं में द्वार
बनाने का विधान किया गया है। तोरण पाँच हाथ का होना चाहिए। तोरण ध्वज एवं
ध्वजाष्टक स्थापित करे।
वैभवहीन लोगों के लिए संक्षिप्त विधान भी किया गया है। इसके अनुसार
अलग-अलग शालाओं के कर्म एक ही शाला में पूर्ण किए जाते हैं। ३५ हाथ लम्बा
और उसका चौथाई चौड़ा याग मण्डप होता है। वेदियौं के निर्माण भी बारह अंगुल के
अन्तराल पर होते हैं। चारों ओर वीथी का मान चार हाथ होता है। यदि सात वेदी
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निर्माण के लिए स्थान न हो तो पाँच ही वेदी बनावे । स्नान एवं नयनोन्मीलन मण्डप से
रहित पाँच वेदी का निर्माण होता है ।
इसके बाद प्रासाद के मध्य में कुम्भ स्थापन किया जाता है । याग गृह में जहाँ
जिसका उपयोग सम्भव होता है वहाँ के उपकरण पहले से रख दिए जाते हैं । ध्वजाओं
पर चक्रराज का अर्चन द्वारपालीय साम से किया जाता है । यागगृह में प्रवेश शाकुन
सूक्त एवं श्रीसूक्त द्वारा होता है । विभिन्न घटों में अलग-अलग द्रव्य डाले जाते हैं और
देवताओं के वामभाग एवं अग्निकोण में दस पंक्ति में कलश रखे जाते हैं और द्वादशाक्षर
मन्त्र से पूजा होती है । इसके बाद नयनोन्मीलन विधान के अनन्तर कलश से व्यूह मन्त्र
द्वारा स्नान कराकर अर्चन होता है । फिर बिम्ब में प्राण प्रतिष्ठा की जाती है । फिर
विभिन्न मन्त्रों से अर्चन किया जाता है ।
इसके बाद गरुड़ मन्त्र से तथा परिवार मन्त्र से तर्पण करते हैं । द्वादशाक्षर मन्त्र
जप के लिए वैष्णवों को नियुक्त किया जाता है । चौकोर पीठ पर बिम्ब को स्थापित
करना हितकारी कहा गया है । पीठ पर आठ लौहमय चक्र स्थापित होते हैं । इसके बाद
प्रासाद संशोधन की प्रक्रिया कही गई है । फिर कुम्भस्थापन विधान वर्णित है । पीठ पर
अन्य मूर्तियों का स्थापन निर्णय किया गया है । पहले से प्रतिष्ठित किन्तु मान से अधिक
की प्रदक्षिणा करने से ऊर्जा की हानि होती है । मानहीन बिम्ब के स्थापन से संस्थापक
के सुत एवं सुख की हानि होती है । जहाँ भक्तों की सिद्धि के लिए देवालयों में अर्चना
प्रतोली, आँगन, जगती तथा देवमन्दिर हैं तथा पीठ सहित भगवद् बिम्ब है और
प्रदक्षिणा के लिए पर्याप्त स्थान है वह देवतायतन श्वेत द्वीप के समान है । परिच्छेद के
अन्त में पुराने मन्दिर के जीर्णोद्धार की विधि भी बतलायी गई है ।
श्रीगंगासप्तमी, २३.४.२००७ विद्वद्वशंवदः
वैशाख शुक्ल, वि.सं. २०६४ सुधाकर मालवीयः
विषयानुक्रमणिका
प्रथमः परिच्छेदः १ - ११ | परब्रह्मस्वरूपकथनम् ३१
प्रश्नप्रतिवचनम् | प्रीतिसंकल्पभोगदानमन्त्राः ३४
मलयाचले नारदस्यागमनम् २ | तृतीयः परिच्छेदः ३६ - ४४
नारदस्य परशुरामदर्शनम् २ | सुषुप्तिव्यूहसमाराधनम्
नारदं प्रति ऋषीणां प्रार्थना ५ | पदानां वर्णसंख्यापूरणप्रकार-
नारदस्य प्रतिवचनम् ६ | कथनम् ४३
सङ्कर्षणप्रश्नः ७ | चतुर्थः परिच्छेदः ४५ - ५२
वासुदेवप्रतिवचनम् ७ | स्वप्नव्यूहसमाराधनम्
त्रिविधं परमं ब्रह्म ७ | वासुदेवादीनां लक्षणकथनम् ४७
परत्वादिलक्षणकथनम् ८ | स्वप्नव्यूहमन्त्रचतुष्टयोद्धारः ५०
व्यूहलक्षणम् ९ | पञ्चमः परिच्छेदः ५३ - ७०
विभवलक्षणम् ९ | जाग्रत्यूहसमाराधनम्
द्वितीयः परिच्छेदः १२ - ३५ | वासुदेवादीनां विशेष लक्षणानि ५५
तुरीयव्यूहसमाराधनम् | सामान्यलक्षणानि ५७
उपासनाविधिविषयकः सङ्कर्षणप्रश्नः १२ | जाग्रत्यूहमन्त्रचतुष्टयोद्धारः ५८
चतुर्विधाधिकारिनिरूपणम् १४ | पुरुष, सत्य, अच्युत, वासुदेव-
परार्चनविधानम् १५ | मन्त्रोद्धारः ६२
वर्णचक्ररचनाप्रकारः १५ | चतुरङ्गाद्वर्णचक्रात् सर्वमन्त्राणामुद्धारः ६३
मन्त्रोद्धारविवेचनम् १७ | तुर्य-सुषुप्ति-स्वप्न-जाग्रद्व्यूह-
द्वाविंशाक्षरः षड्भिः पदैरन्वितः | लक्षणानि ६३
परमन्त्रः १८ | वर्णकालस्थानभेदेन वासुदेवादीनां
मन्त्रान्तर्गतषट्पदानां | ध्यानकथनम् ६६
षाड्गुण्याभिधायकत्वम् १९ | चातुरात्म्यसमाराधनोपसंहारः ६७
षडङ्गमन्त्राः २१ | भगवदवतारक्रमः ६७
निरङ्गो ब्रह्मलक्षणो मन्त्र २२ | बहिर्यागोपक्रमः ६९
पञ्चाङ्गो नेत्रान्तो मन्त्रः २३ | षष्ठः परिच्छेदः ७१ - १३५
यागोपकरणानामासादनस्थाननियमम् २६ | चातुरात्म्यबाह्याराधनम्
मन्त्रन्यासविधिकथनम् २७ | भद्रपीठशोधनविधानम् ७१
शब्दब्रह्मावस्थानम् २९