सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ सात्त्वतसंहिता
१९. दीक्षाविधि नामक उन्नीसवें परिच्छेद में दीक्षा का विधान है । तीन प्रकार
की दीक्षा होती है । १. जो कैवल्य मुक्ति रूप फल प्रदान करे, २. जो दीक्षा भोग एवं
कैवल्य दोनों प्रदान करे और ३. जो केवल भोग प्रदान करे । शिष्य के स्वप्न की परीक्षा
करके गुरु दीक्षा देवे । इसी सन्दर्भ में शुभाशुभस्वप्नों का विवेचन प्रस्तुत है । अशुभ
स्वप्न की शान्ति के अनन्तर कुम्भादि अर्चन क्रम आरम्भ करे । फिर शिष्य का वैष्णव
नामकरण करे । शिष्य, मण्डल, कलश तथा गुरु को नमस्कार कर निर्दोषता के लिए
भूतशुद्धि करे । शिष्य बिम्ब के अग्रभाग में पुष्पाञ्जलि समर्पण करे । सहस्र संख्या में
मूलमन्त्र से प्रायश्चित्त होम कर शिष्य शिर से पैर तक सूत्र से अपने को नापकर सूत्र
प्रसारण कर्म करे । फिर शिष्य में, भगवान् में, सूत्र में तथा अपने में अकस्मात् अध्वा
का दर्शन करे । अध्वस्मरण करके आहुतियाँ प्रदान करे । फिर पृथ्व्यादि तत्त्वों का
सन्तर्पण करे ।
फिर शिष्य के चैतन्य का अपने हृदय में सङ्कर्षण करे । फिर शिष्य के लिए
भुवनाध्वादि का उपदेश करे । क्ष्मा तत्त्व का विज्ञापन, अप्तत्त्व का संस्कार करके जल
देवता से प्रार्थना करे कि मुझमें रस तन्मात्रा विद्यमान रहे ।
इसी प्रकार तेजस्तत्त्व से लेकर मनस्तत्त्वान्त का तथा मन्त्राध्वा से लेकर वर्णाध्वा
पर्यन्त चारों का संस्कार करे । फिर ऐश्वरबीज के द्वारा जप एवं ध्यान लक्षण समाधि में
लीन होकर द्वैत मात्र का अनुभव करे । फिर समाधि की सिद्धि हेतु आचार्य सौ आहुति
प्रदान करे । 'व्यूह दीक्षा' एवं 'ब्रह्म दीक्षा' इन दोनों का केवल मोक्ष के अतिरिक्त और
कोई फल नहीं है ।
२०. अभिषेक विधि नामक बीसवें अध्याय में दीक्षा के अनन्तर शीघ्र ही
शिष्य का अभिषेक वर्णित है । सभी मन्त्रों की सिद्धि के लिए तथा सभी मन्त्रों पर
अधिकार प्राप्ति के लिए अभिषेक होता है । अन्त में गुरुयाग का विधान है ।
२१. समयविधि नामक इक्कीसवें अध्याय में शिष्य के लिए विभिन्न आचारों
का निर्देश है । वैष्णवधर्म परायणों का विष्णुवत् पूजन करे । पुष्प आदि का आहरण
स्वयं अस्त्रमन्त्र से अपनी वाटिका से करे । फिर पूजा द्रव्यों का ग्राह्याग्राह्यत्व कहा गया
है । कांस्य पात्र में भोजन न करे । कांसे में अर्घ भी न दे । अवैष्णव से कभी भी सम्बन्ध
न रखे । चातुर्मास्य व्रत के अनुष्ठान का स्थान पुण्यक्षेत्र होना चाहिए । समय पञ्चक के
यथावत् परिपालन से अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है और सुप्रसन्न मन से यथावत् कालुष्य
रहित होकर साधक आनन्द समुद्र में स्नान करता है तथा उसकी आत्मा सदैव प्रसन्न
रहती है ।
२२. अधिकारिमुद्राभेदविधि नामक बाइसवें परिच्छेद में सामयिक, साधक,
पुत्रक और आचार्य चारों प्रकार के शिष्यों के लक्षण कहे गए हैं ।
२३. अधिवासदीक्षाविधि नामक तेइसवें परिच्छेद में पद्मनाभ एवं ध्रुवादि
विभव देवताओं के पिण्डमन्त्रगणों को कहा गया है । फिर किरीटादि १७ लाञ्छन मन्त्रों
का उद्धार किया गया है ।