सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः परिच्छेदः
तुरीयव्यूहसमाराधनम्
नारद उवाच
श्रुत्वैवमच्युतमुखाद् देवदेवो हलायुधः ।
हितार्थं भवभीतानां पुनराह द्विजोत्तमाः ॥ १ ॥
सङ्कर्षण उवाच
विधिना कीदृशेनैव ह्युपासा विहिताऽत्र वै ।
उपासकानां भक्तानां समासाद् ब्रूहि मे विभो ॥ २ ॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु सम्यक् प्रवक्ष्यामि यदहं चोदितस्त्वया ।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्जन्म पुनरेवाप्नुयान्नरः ॥ ३ ॥
अथ द्वितीयः परिच्छेदो व्याख्यास्यते । इह आदौ वासुदेवसङ्कर्षणयोर्भगवदुपा-
सनप्रकारविषयकप्रश्नप्रतिवचनक्रममाह—श्रुत्वेत्यादिश्लोकत्रयेण ॥ १-३ ॥
नारद जी ने कहा—हे द्विजोत्तम गण ! अच्युत के मुख से इस प्रकार की
बातें सुनकर देवाधिदेव हलायुध ने इस संसार से भयभीत होने वालों के हित के
लिये पुनः पूछा ॥ १ ॥
सङ्कर्षण ने कहा—हे विभो ! आपने राग से दूर रहने के लिये उपासना का
उपदेश दिया (१.२४) । अतः संक्षेप में बताइये कि यह 'उपासना' उपासक भक्तों
को किस प्रकार करनी चाहिये? ॥ २ ॥
श्रीभगवान् ने कहा—हे सङ्कर्षण ! जिस प्रश्न को आपने मुझसे पूछा है, मैं
उसका उत्तर सात्त्वततन्त्र में उपदिष्ट उपदेश के अनुसार दे रहा हूँ, जिसको जान
लेने पर भक्त पुनः जन्मादि को प्राप्त नहीं करते ॥ ३ ॥
ब्राह्मणानां च सद्ब्रह्मवासुदेवाख्ययाजिनाम् ।
लक्ष्यभूतं यदासृष्टेर्हृदिस्थमधिकारिणाम् ॥ ४ ॥