सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 684, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशः परिच्छेदः ६२५
न्यसेद् विद्रुमजालं च द्वयोर्मुक्ताफलानि च ।
अर्घ्योदकमथैकस्मिन् नदीतीर्थोदकं द्वये ॥ ८३॥
इसी प्रकार एक कलश में विद्रुम जाल तथा दूसरे में मुक्ता फल स्थापित
करे । एक कलश में अर्घ्योदक, तथा नदी का जल एवं तीर्थ का जल, दो कलशों
में अलग-अलग रखे ॥ ८३ ॥
सर्वौषधिघटं चैव सुशीताम्भोघटं ततः ।
सुगन्धपुष्पकलशं चत्वारिंशत् त्वमी स्मृताः ॥८४ ॥
एक कलश में सर्वौषधि, एक में सुशीत जल तथा एक कलश में सुगन्ध
पुष्प स्थापित करे । यहाँ तक चालीस घटों में स्थापित किये जाने वाले द्रव्यों का
विवरण कहा गया ॥ ८४ ॥
वामभागे तु देवस्य अग्निकोणादितो न्यसेत् ।
यातुधानपदं यावत् क्रमाद् द्विद्विकसंख्यया ॥ ८५ ॥
दशपङ्क्तिनियोगेन एवमन्ये तु पृष्ठतः ।
ईशकोणात् समारभ्य यावदाग्नेयगोचरम् ॥ ८६ ॥
शीताम्बुपूरितानां च घटानां केवलं न्यसेत् ।
पुनरीशानकोणात् तु शयने सप्तधा न्यसेत् ॥ ८७ ॥
गन्धोदकेन सम्पूर्णांस्तथा वायुपदावधि ।
सर्वाण्याधाररूढानि पूरितान्यमलाम्भसा ॥ ८८ ॥
मूलमन्त्रेण तदनु पूजयेद् द्वादशात्मना ।
संवेष्ट्य च पुरा सूत्रैश्छादयेत् तदनन्तरम् ॥ ८९ ॥
विधानैः सूत्रसम्बन्धैर्वस्त्रेणाच्छाद्य वै ततः ।
इसी प्रकार देवता के वामभाग में अग्निकोण से लेकर नैर्ऋत्यकोण पर्यन्त
क्रमशः दो-दो की संख्या के अनुसार दश पङ्क्ति में कलश स्थापित करे । इसी
प्रकार पीछे ईशानकोण से आरम्भ कर आग्नेयकोण तक केवल शीत जल पूरित
कलश स्थापित करे । इसी प्रकार शयन स्थान में भी ईशानकोण से लेकर वायव्य
कोण तक गन्धोदक से पूर्ण सात कलश स्थापित करे । तदनन्तर स्वच्छ जल से
परिपूर्ण आधार पर स्थापित सभी कुम्भों की द्वादशाक्षर मन्त्र से पूजा करे । उन्हें
प्रथमतः सूत्र से संवेष्टित करे । फिर वस्त्र से आच्छादित करे ॥ ८५-९० ॥
तदर्पणावसानेऽथ शयनं कल्पयेद् द्विधा ॥ ९० ॥
सर्वोपकरणोपेतमनन्तं तदधो यजेत् ।
प्रभावाप्यययोगेन तदूर्ध्वं सर्वगं प्रभुम् ॥ ९१ ॥