सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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छोड़कर गर्भ के आधे वाले मध्य भाग से निकली हुई प्रासाद की नाड़िका का
निर्माण करे ॥ ३९१-३९२ ॥
पादेन वा त्रिभागेन सस्तम्भाऽप्यथ केवला ।
उन्नता शिखराधेन साऽप्युत्पलदलोपमा ॥ ३९३ ॥
दोनों पक्ष में रहने वाले दो भागों को छोड़कर मध्य भाग गण से गर्भ के
आधे भाग से निकली हुई प्रासाद नाड़िका निर्माण करे । वह एक पाद से अथवा
तीन भाग से स्तम्भ के साथ अथवा केवल निर्माण करे । शिखर के आधे भाग के
समान ऊँची कमल दल के आकार की बनावे ॥ ३९२-३९३ ॥
कार्या शिखरपीठोध्र्वे दिव्यकर्मविभूषिता ।
ततः शुभतरं कुर्यान्मण्टपं स्तम्भसंयुक्तम् ॥ ३९४ ॥
शिखर पीठ के ऊर्ध्व भाग में दिव्यकर्म से विभूषित बनावे । तदनन्तर स्तम्भ
से युक्त शुभ मण्डप निर्माण करे ॥ ३९४ ॥
भूषितं विहगेन्द्रेण बलिमण्डलगेन च ।
चतुर्द्वारि तथा दिक्षु विधेयं मण्टपत्रयम् ॥ ३९५ ॥
उसको गरुड़ से तथा बलि मण्डल में रहने वाले देवताओं से युक्त बनावे ।
चारों द्वार में तथा दिशाओं में तीन मण्डप बनवाना चाहिये ॥ ३९५ ॥
प्रवेशत्रितयोपेतं मण्टपे मण्टपं भवेत् ।
कुर्यान्मण्टपमुक्तं वा यथाभिमतनिर्गमम् ॥ ३९६ ॥
उसमें तीन प्रवेश द्वार बनावे, मण्डप में मण्डप बनवाये, उसमें से निकलने
के लिये द्वार मण्डप को छोड़कर बनावे, अथवा यथाभिमत बनावे ॥ ३९६ ॥
रथोपरथकाद्यं तु तेषां गर्भाद् विधीयते ।
निर्यासो दशमांशेन द्वादशांशेन लाङ्गलिन् ॥ ३९७ ॥
अथवा षोडशांशेन ते कार्या नेमिवत् पुनः ।
चतुर्दिक्पक्षसंलिप्ताः पीठकर्मविभूषिताः ॥ ३९८ ॥
रथ उपरथकादि उनके गर्भ से निर्माण करे । हे लाङ्गलिन ! उसके निर्यास
(निकलने के लिये स्थान?) दशमांश अथवा द्वादशांश से निर्माण करावे । अथवा
षोडशांस से अथवा नेमिवत् करावे उसके चारों दिशाओं में पक्ष निर्माण करावे
और उसे पीठ कर्म से विभूषित करे ॥ ३९७-३९८ ॥
शिखरस्य चतुर्दिक्षु पीठोपरि समापयेत् ।
समं रथकयुक्त्या तु नासिकामञ्जरीगणम् ॥ ३९९ ॥