सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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धर्माद्याश्चाग्निकोणात् तु यावदीशपदं पुनः ।
प्रागादावुत्तरान्तं च अधर्माद्यं चतुष्टयम् ॥ ३४८ ॥
शिलानामन्तरे भूमौ षट्कं षट्कं क्रमेण तु ।
न्यस्तव्यं पूर्ववर्णाच्च वर्णानां सावसानकम् ॥ ३४९ ॥
अग्निकोण से लेकर ईशानकोण पर्यन्त धर्मादि की तथा पूर्व दिशा से लेकर
उत्तर दिशा पर्यन्त अधर्मादि चार की स्थापना करे । शिलाओं के अन्तर में भूमि
पर छः-छः के क्रम से (अकारादि पूर्व वर्ण से 'स' पर्यन्त ४८ वर्णों की) स्थापना
करे ॥ ३४८-३४९ ॥
शब्दब्रह्मानुविद्धां च कृत्वैवं बुद्धिवागुराम् ।
सूत्रभूतां न्यसेत् सम्यक् प्रासादतलसंस्थिताम् ॥ ३५० ॥
इस प्रकार शब्द ब्रह्म से अनुविद्ध को बुद्धि वागुर बना कर उसे सूत्र रूप
बना कर प्रासाद तल में स्थापित करे ॥ ३५० ॥
न्यसेत् प्राङ्गणभित्त्यर्थं तथैव हि शिलाष्टकम् ।
तासु संरोधयेत् सम्यक् प्रागुक्तांस्तु दिगीश्वरान् ॥ ३५१ ॥
वहाँ प्राङ्गणभित्ति के लिये आठ शिला स्थापित करे । उसमें पहले कहे गये
इन्द्रादि आठ दिगीश्वरों का सन्निरोध करे ॥ ३५१ ॥
चक्रं तदन्तर्भूमीनां भ्रमद्वह्निस्फुलिङ्गवत् ।
क्षार्णेन चिन्तयेद् व्याप्तं भूभागं चाङ्गोणीयकम् ॥ ३५२ ॥
उसके भीतर की भूमि में जहाँ आंगन वाला भूभाग है वहाँ चक्कर काटते
हुए अग्नि स्फुलिङ्ग के समान चक्र का 'क्ष' वर्ण से ध्यान करे ॥ ३५२ ॥
आभोगं तदधः शेषं तदूर्ध्वं गगनेश्वरम् ।
बहिः प्राङ्गणभित्तीनां सास्त्रं सपरिवारकम् ॥ ३५३ ॥
प्राङ्गण भित्ति का जहाँ आभोग है वहाँ शेष का, उसके ऊपर गगनेश्वर का
और उसके बाहर सपरिवार अस्त्र मन्त्र का स्मरण करे ॥ ३५३ ॥
प्रागादावीशकोणान्तमिन्द्राद्यं चाष्टकं न्यसेत् ।
तथाविधेषूपलेषु अन्तर्भूमिगतेषु च ॥ ३५४ ॥
तत् स्वनाम्नाऽर्चयित्वा तु ऋग्वेदान् पाठयेत् ततः ।
क्लीबो न विद्वानिति वै ये देवास्तु यजुर्मयान् ॥ ३५५ ॥
पूर्व से प्रारम्भ कर ईशानकोण पर्यन्त भूभाग में इन्द्रादि आठ दिगीश्वरों का
न्यास करे । तदनन्तर उस प्रकार की शिला, जो भीतर की भूमि में स्थित है,