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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 629

५७० सात्वतसंहिता
अथ वराहवक्त्रलक्षणमाह—दैर्घ्येण सार्धतालं चेत्यादिभिः ॥ १८८-१९४ ॥
अब वराह के मुख का लक्षण कहते हैं—वराह का मुख लम्बाई में १ १/२
डेढ़ ताल होना चाहिये । विस्तार में ललाट तक उसका मान दो अङ्गुल कम होना
चाहिये । सौम्य रूप पृथ्वी उद्धार के लिये उद्यत उन विभु का मुख एक कला
रहित होना चाहिये ॥ १८८-१८९ ॥
तच्चतुर्थांशमानेन पोत्रदेशस्य विस्तृति ।
तस्योपरिष्टाद् बाहुल्यं तत्समं चाङ्गुलं त्वधः ॥ १९० ॥
उनके पौत्र देश का विस्तार मान में चतुर्थांश होना चाहिये । उसके ऊपर
का बाहुल्य उसके समान होना चाहिये और नीचे का मान एक अङ्गुल होना
चाहिये ॥ १९० ॥
हनुद्वयस्य वै मानं सार्धं सप्ताङ्गुलं स्मृतम् ।
शेषमाननरन्ध्रं तु सृक्किणीभ्यां यदन्तरम् ॥ १९१ ॥
वाराह के दोनों हनु का मान सात अङ्गुल कहा गया है । शेष मुख का छिद्र
दोनों सृक्किणी में जितना अन्तर है उतना होता है ॥ १९१ ॥
तद्विकासश्च सार्धेन कलार्धेनाग्रदेशतः ।
स एवाङ्गुलमानेन विज्ञेयः सृक्किणीद्वयात् ॥ १९२ ॥
उसका विकास अग्रदेश से सार्ध कलार्ध मान का होता है, दोनों सृक्किणियों
से वह विकास एक अङ्गुल मान का होता है ॥ १९२ ॥
घ्राणरन्ध्रं च वक्त्रोक्ते दंष्ट्रे द्व्यर्थकलोन्नते ।
नासावंशं यथापूर्वं कदलीनाडिपृष्ठवत् ॥ १९३ ॥
नाक का छिद्र मुख के दो दाँत द्वयार्ध कला उन्नत होना चाहिये । नासावंश
(प्रशस्त नासिका) यथापूर्व केला की नाड़ी के पृष्ठभाग के समान करे ॥ १९३ ॥
श्रोत्रे वाजिमुखोक्ते तु कोटेः सप्तकलान्तरे ।
तत्तुल्ये लोचने किन्तु प्रान्ततीक्ष्णे यवोज्झिते ॥ १९४ ॥
दोनों श्रोत्र हयग्रीव के मुख के समान एवं दोनों किनारों का अन्तर सात
कला का होना चाहिए । लोचन भी उतने ही बसबर जो दोनों प्रान्त में तीक्ष्ण और
यव से कम होने चाहिये ॥ १९४ ॥
एतेषां विहिता ग्रीवा ह्यङ्गुलद्वितयेन तु ।
प्रत्येकदेशात् संयुक्ता सौम्यमूर्त्युदिता च या ॥ १९५ ॥