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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 626, कुल 837 में से

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पृष्ठ 626

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६७
तद् वै विषमपादस्य अग्रात् तालसमं स्मृतम् ॥ १६८ ॥
समपादविषमपादबिम्बानां सूत्रेणावयवसाम्यपरीक्षामह—ऋजोः सुसमपादस्ये-
त्यारभ्य बिम्बोत्थाऽवयवी स्थितिरित्यन्तम् ॥ १६८-१७४ ॥
समपाद एवं विषमपाद वाले बिम्बों का सूत्र से अवयव साम्य की परीक्षा—
जिसका पैर सीधा हो, समतल हो, उसके चरणों का अन्तर तीन अङ्गुल होता है ।
विषमपाद के आगे का अन्तर एक ताल के बराबर होता है ॥ १६७-१६८ ॥
तत्पाष्णिर्द्वयमध्यात् तु परिज्ञेयं द्विगोलकम् ।
स्थित्यर्थं ब्रह्मनाड्या वै तथा मार्गद्वयस्य च ॥ १६९ ॥
सूत्रेण सुसमे कुर्याद् देहोत्थे दक्षिणोत्तरे ।
समपादस्य बिम्बस्य ललाटान्मेढ्रमस्तकम् ॥ १७० ॥
प्रसार्य सूत्रमाच्छाद्य तेन नाभिहृदन्तरम् ।
घ्राणाग्रमलकानां च सन्धिर्यस्तिलकोध्वंगः ॥ १७१ ॥
एवं विषमपादस्य दक्षाङ्गुष्ठाग्रगं नयेत् ।
गात्रसाम्यं समापाद्यं क्षेत्रात् क्षेत्रगतेन च ॥ १७२ ॥
सूत्रेण सर्वबिम्बानां वैषम्यविनिवृत्तये ।
चतुस्त्रिद्व्यश्रिपरितः परिशुद्धा यतः शुभाः ॥ १७३ ॥
अशुभाऽपरिशुद्धा तु बिम्बोत्थाऽवयवी स्थितिः।
वही अन्तर उसके दोनों पाणि के मध्य से दो गोलक समझना चाहिये ।
ब्रह्मनाडी और उसके दोनों मार्ग की स्थिति के लिये देह के दक्षिण और उत्तर भाग
को सूत्र के समान बनावे । समपाद वाले बिम्ब के ललाट से मेढ़ मस्तक तक
नाभिहृदय को, घ्राणाग्र अलक की सन्धि, जो तिलक के ऊपर रहती है उसको,
सूत को लम्बा कर उससे आच्छादित करे । इसी प्रकार समपाद एवं विषमपाद के
सूत्र को भी दाहिने हाथ के अङ्गुष्ठ के अग्रभाग तक ले जावे । इस प्रकार क्षेत्र से
क्षेत्रगत तक गात्रसाम्य की समता करे । उस सूत्र से सभी बिम्बों की विषमता की
निवृत्ति के लिये चार, तीन एवं दो आवे तो वह चारों ओर से शुद्ध समझना
चाहिये । वही शुभ है किन्तु बिम्ब से होने वाले अवयवी स्थिति अपरिशुद्ध एवं
अशुभ है ॥ १६९-१७४ ॥
हयग्रीवबिम्बस्य मुखलक्षणकथनम्
ललाटमश्ववक्त्रस्य विस्ताराद् द्वादशाङ्गुलम् ॥ १७४ ॥
अथ हयग्रीवबिम्बस्य मुखलक्षणमाह—
ललाटमश्ववक्त्रेत्यादिभिः ॥ १७४-१८० ॥