सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५६३
चतुर्यवं च तत्कोशं वेष्टनं तु षडङ्गुलम् ॥ १४१ ॥
द्व्यङ्गुलौ वृषणौ दैर्घ्यान्मूलान्तसमविस्तृतौ ।
परितो द्व्यङ्गुलं विद्धि वायुरन्ध्रं सुवर्तुलम् ॥ १४२ ॥
वह चारों ओर एक अङ्गुल प्रमाण में होनी चाहिये । मेढ्र (लिंग) तीन कला
का होना चाहिये और उसका कोश चार यव का होना चाहिये । उसकी गोलाई छः
अङ्गुल होनी चाहिये । अण्डकोश लम्बाई चौड़ाई में समान दो अङ्गुल का तथा
वायु का रन्ध्र (गुदा) चारों ओर से गोला दो अङ्गुल का बनावे ॥ १४१-१४२ ॥
ऊरुमानं परिज्ञेयं मध्यभूमेर्नवाङ्गुलम् ।
षट्कलं मूलदेशाच्च अग्रान्तं त्रिकलं स्मृतम् ॥ १४३ ॥
मध्य भूमि से नव अङ्गुल के मान का ऊरु होना चाहिये । मूल देश से छः
कला का तथा अग्रान्त तीन कला का होना चाहिये ॥ १४३ ॥
हीनमेकाङ्गुलेनैव द्विकलं जानुमण्डलम् ।
विस्तारेणोन्नतत्वेन चतुर्यवसमं तु तत् ॥ १४४ ॥
एक अङ्गुल से कम दो कला मान का जानु मण्डल होना चाहिये । विस्तार
और उन्नति में उसे ४ यव का बनाना चाहिये ॥ १४४ ॥
जङ्घामूले परिज्ञेयं वेष्टनं नवगोलकम् ।
द्विसप्ताङ्गुलकं मध्ये सार्धपञ्चाङ्गुलं ततः ॥ १४५ ॥
जङ्घा, मूल में वेष्टन का मान नव गोलक होना चाहिये । मध्य में चौदह
अङ्गुल और उसके बाद साढ़े पाँच अङ्गुल होना चाहिये ॥ १४५ ॥
अत्रापि वेष्टनाद् विद्धि तृतीयांशेन विस्तृतम् ।
मध्यमूलावसानेभ्यो विस्तारमनुगुण्य तु ॥ १४६ ॥
यहाँ पर भी वेष्टन से मध्य, मूल तथा अन्त तक का विस्तार तृतीयांश से
विस्तृत करे ॥ १४६ ॥
भुजाभ्यां मध्यदेशस्य तथाङ्गुलिगणस्य च ।
ऊरुयुग्मस्य जङ्घाभ्यामापाद्या द्विपहस्तता ॥ १४७ ॥
दोनों भुजाओं के मध्य देश अङ्गुलिगणों को, दोनों ऊरुओं को, दोनों जाङ्घों
को हाथी के हाथ के समान उतार चढ़ाव युक्त निर्माण करे ॥ १४७ ॥
सतालभागमानं च दैर्घ्यं वै चारणं स्मृतम् ।
पार्ष्णी द्विगोलकतते तन्मध्ये साङ्गुले कले ॥ १४८ ॥