सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 620, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५६१
अर्धाङ्गुलाग्रतो न्यूना विद्धि मध्यं क्रमक्षतम् ।
निजलक्ष्मोपलं चाग्रात् साङ्गुलं द्विकलं करम् ॥ १२७ ॥
कनिष्ठा अङ्गुली सार्ध कला (१ १/२) तथा अङ्गुष्ठ मूल वेष्टन से कम होनी
चाहिये । अन्य तीन अङ्गुलियाँ छः यव की कही गई हैं । मध्य अङ्गुलि आगे से
आधा अङ्गुल कम तथा क्रमशः हीन निर्माण करे ॥ १२६-१२७ ॥
ईषन्निम्नतलं चैव लक्ष्मरेखाविभूषितम् ।
शाखामूलावधेः पाणी बाहुल्यं द्वे यवेऽङ्गुलम् ॥ १२८ ॥
चतुर्यवाधिकं चैव मणिबन्धावधेः स्मृतम् ।
मध्ये कलार्धहीनं तु तद्बाहुल्यमुदाहृतम् ॥ १२९ ॥
ईषन्निम्नतल तथा लक्ष्मरेखा से विभूषित अङ्गुली पर्यन्त हाथ का निर्माण
करे और उसका बाहुल्य दो यव युक्त एक अङ्गुल बनाये तथा मणिबन्धावधि
पर्यन्त चार यव से अधिक निर्माण करे । उसका बाहुल्य मध्य में आधा कला से
कम रखे ॥ १२८-१२९ ॥
मणिबन्धावधेर्बाहुवेष्टनं षट्कलं स्मृतम् ।
सन्धेः सप्तकलं विद्धि साङ्गुलं त्रियवच्युतम् ॥ १३० ॥
हीनमर्धाङ्गुलेनैव मूलाद् वै नवगोलकम् ।
तथैव सन्धेरूर्ध्वात् तु विस्तारः प्राग्वदत्र च ॥ १३१ ॥
मणिबन्ध पर्यन्त बाहु का वेष्टन छः कला का निर्माण करे । सन्धि सात
कला की तथा तीन यव कम एक अङ्गुल युक्त होनी चाहिए । वह मूल से आधा
अङ्गुल कम नव गोलक की होनी चाहिये । उसी प्रकार सन्धि की लम्बाई भी
बनावे ॥ १३०-१३१ ॥
अत्रापि पूर्ववद् दृष्ट्या कार्याऽन्तःस्था क्षितिः स्वयम् ।
तालं गलावधेस्त्यक्त्वा तन्मानेनान्तरीकृतम् ॥ १३२ ॥
यहाँ भी पहले की तरह गले की अवधि से एक ताल स्थान त्याग देवे और
उतने ही मान के अन्तर में दृष्टि पर्यन्त भीतरी स्थान खाली रहने दे ॥ १३२ ॥
स्तनद्वयं समं कुर्यात् तद्धारा च समांसला ।
निम्नं हृद्गोलकार्धेन ऊर्ध्वतो रत्नराड्यूतम् ॥ १३३ ॥
दोनों स्तन समान आकृति में निर्माण करे । उसकी धार मांसल (मोटा) युक्त
बनावे । उसका निचला भाग हृद्गोलक के आधे भाग से तथा ऊपरी भाग रत्नराज
से युक्त बनावे ॥ १३३ ॥