सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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तस्मिन् कालेऽन्यत्र वाव्रज्या गुरुणा सहानुव्रजनं पुनस्तदनुज्ञया निवर्तनकाले
प्रणिपतनप्रदक्षिणादिभिर्गुरोः प्रसादीकरणं चाह—
व्रजन्तमिति सार्धद्वाभ्याम् ॥ ३८-४० ॥
॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य
योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते
सात्वततन्त्रभाष्ये विंशः परिच्छेदः ॥ २० ॥
तदनन्तर उनकी इच्छा से लौट आवे । फिर गुरु के चरणों पर गिर कर
नमस्कार करे एवं प्रदक्षिणा करे ॥ ३८-३९ ॥
मोक्ष पर्यन्त समस्त सिद्धि प्रदान करने वाले तथा भगवदाराधन परायण भक्तों
के लिये एकमात्र सर्वश्रेष्ठ गुरु ही परागति हैं, अतः वही प्रसाद्य हैं और संस्मरणीय
भी हैं ॥ ४० ॥
॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के अभिषेकविधि
नामक बीसवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ २० ॥