सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 420, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः परिच्छेदः ३६१
दाहिने दोनों हाथों में कालानल के समान प्रकाशित चक्र, बायें दोनों हाथों में
धनुष के सहित (बाण) विद्यमान है। पुनः दोनों हाथों में अविद्यादलिनी मुद्रा धारण
किये हुए हैं ऐसे प्रभु का ध्यान करे ॥ ८३-८४ ॥
इसी प्रकार कुमुद के समान स्वच्छ हृन्मन्त्र का ध्यान करना चाहिये। पद्म-
राग पर्वत के आकार के समान आरक्त हृन्मन्त्र (नमः) के शिर का स्मरण करे।
अञ्जन पर्वत के समान उसी आकृति वाले शिखा मन्त्र का स्मरण करे ॥ ८५ ॥
जिस प्रकार सूर्य की किरणों से चारों ओर सुवर्ण पर्वत चमचमाता रहता है
उसी प्रकार देदीप्यमान कवचमन्त्र का ध्यान काल में चिन्तन करे ॥ ८६ ॥
सहस्रों अग्नि ज्वाला से युक्त अयस्कान्तमणि के समान देदीप्यमान सम्पूर्ण
शक्तिसम्पन्न अस्त्रमन्त्र कहा गया है उसका स्मरण करे ॥ ८७ ॥
धूम रहित अङ्गार पर्वत के समान नेत्र-मन्त्रराज का ध्यान करे। अपनी
रुचि के अनुसार पुरुषोत्तम की दो भुजाओं का स्मरण करे ॥ ८८।
अस्त्र सहित कौस्तुभ तथा गदा एवं वनमाला इत्यादि स्त्री वेश वाले
विकसित कमल के समान मनोहर स्वरूप वाली महाश्री एवं नाल संयुक्ता नलिनी
का ध्यान करे ॥ ८९ ॥
चन्द्रमा की चन्द्रिका के समान प्रकाश वाली, श्वेत चामरधारिणी पूर्णचन्द्र के
समान हाथ में चामर लिये हुए पुष्टि का स्मरण करे ॥ ९० ॥
अमृत से सम्पूर्ण कनक, कलश तथा विज्ञान-पुस्तक हाथ में लिये हुए
स्फटिक के समान शुभ्र वर्ण वाली सरस्वती का स्मरण करे ॥ ९१ ॥
विकसित कमल के समान शोभा वाली हाथ में अक्षसूत्र धारण किये हुए
सभी देव लक्षणों से युक्त भगवती निद्रा का ध्यान करे, जो वस्त्रालङ्कार से
मण्डित देवाधिदेव के सम्मुख स्थित हैं, इस प्रकार ध्यान करे ॥ ९२-९३ ॥
एवं ध्यात्वा ततः कुर्यात् पूजनं कुसुमादिकैः ॥ ९३ ॥
स्नानैर्विलेपनैर्वस्त्रैर्माल्यैर्धूपैश्च दीपकैः ।
दध्ना च मधुमिश्रेण क्षीरेणाज्यान्वितेन च ॥ ९४ ॥
हृद्यैर्मृष्टैः स्थिरैर्मेध्यैर्नैवेद्यैर्विविधैः शुभैः ।
यथाकालोद्भवैः सर्वैः फलमूलैस्तु षड्रसैः ॥ ९४ ॥
पूजितैर्मुक्तदोषैस्तु मुद्रामन्त्रोपलक्षितैः ।
मूर्त्तैर्ध्यानैस्तथा स्विन्नैर्बीजैर्होमादिनाऽथवा ॥ ९६ ॥
षष्ठपरिच्छेदे विस्तरेणोक्तत्वादिहोपचारानुपूर्वी संक्षेपेणाह—एवं ध्यात्वेत्या-
दिभिः ॥ ९३-९६ ॥
सा० सं० - 27