सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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योगपीठार्चनं कुर्यादनुसन्धानपूर्वकम् ।
स्वनाम्ना प्रणवाद्येन नमोऽन्तेन यथाक्रमम् ॥ ५३ ॥
अनन्तेशं स्मरेन्मध्ये सर्वाधारमयं प्रभुम् ।
आग्नेयादौ तु धर्माद्यमैशान्यान्तं चतुष्टयम् ॥ ५४ ॥
प्रागादावप्यधर्माद्यमुत्तरान्तं न्यसेत् परम् ।
तदूर्ध्वं कमलं ध्यायेत् स्वनाम्नाऽथ तथोपरि ॥ ५५ ॥
स्मरेत् पत्राश्रितं सूर्य शशाङ्कं केसरावनौ ।
कर्णिकास्थं हुतभुजं ततो गन्धादिना यजेत् ॥ ५६ ॥
पीठपरिकल्पनप्रकारमाह—पुष्पैरित्यादिभिः ॥ ५२-५६ ॥
इसके बाद निष्कल मन्त्रों से पुष्प द्वारा अर्घ्यपात्र का पूजन करे। फिर उसमें
से किसी दूसरे पात्र में जल निकाले ॥ ५२ ॥
तदनन्तर सावधानी से उस जल द्वारा प्रणवपूर्वक स्वनाम, तदनन्तर नमः
शब्द से योगपीठ का यथाक्रम अर्चन करे ॥ ५३ ॥
मण्डल के मध्य में सर्वाधारमय प्रभु अनन्तेश का स्मरण करते हुए पूजन
करे। आग्नेय से लेकर ईशानकोण पर्यन्त धर्मादि चार (धर्म, ज्ञान, वैराग्य,
ऐश्वर्यादि) का न्यास करे ॥ ५४ ॥
पूर्व दिशा से लेकर उत्तर दिशा पर्यन्त अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा
अनैश्वर्यादि का न्यास करे। इसके बाद उसके ऊपर अपने नाम से कमल का
ध्यान करे ॥ ५५ ॥
कमलपत्र पर सूर्य का, केशर स्थान पर चन्द्रमा का, कर्णिका पर अग्निदेव
का ध्यान कर फिर गन्धादि द्वारा कमल की पूजा करे ॥ ५६ ॥
महाकुम्भस्थापनकथनम्
गणेशाद्यर्चनं कृत्वा प्रथमं गुरुसन्ततेः ।
प्राप्तानुज्ञोऽथ कलशमादाय शुभलक्षणम् ॥ ५७ ॥
तमम्भसाऽस्त्रजप्तेन सम्पूर्यादौ तु निक्षिपेत् ।
तद्गर्भे काञ्चनं रत्नं बीजान्योषधिसत्फलम् ॥ ५८ ॥
चूतादिविटपोद्भूतां सपत्रां पुष्पमञ्जरीम् ।
कौशेयवस्त्रकण्ठं कृत्वा चन्दनचर्चितम् ॥ ५९ ॥
तन्मध्ये पूजयेन्मन्त्रं साङ्गं सावरणं क्रमात् ।
प्राग्दिङ् मण्डलबाह्येऽथ दत्वा वै पुष्पचक्रिकाम् ॥ ६० ॥
पीठमन्त्रोपजप्तां च तदूर्ध्वे स्थापयेच्च तम् ।