सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः परिच्छेदः ३४५
से चतुर्दश औकार लिखे । फिर उस पर अनुस्वार लगावे । इस प्रकार 'ॐ क्षौं
नमः' यह मन्त्र निष्पन्न होता है जो परमात्मा का वाचक है ॥ ६-७ ॥
पहले कहा गया है कि ज्ञानादि छः गुण ही हृदयादि कहे जाते हैं । अतः
उन्हीं पर (न्यास के लिये) इस वर्ण (क्षं) को भी ६ प्रकार से लिखे । पहले पर
द्वितीय मात्रा (आ), दूसरे पर चतुर्थ मात्रा (ई), तीसरे पर षष्ठ मात्रा (ऊ), चतुर्थ
पर द्वादश (ऐकार), पञ्चम पर चतुर्दश (औ), फिर सभी छः वर्णों पर अनुस्वार
लगावे । किन्तु पञ्चम पर अनुस्वार न लगाकर विसर्ग लगाये । फिर सबके अन्त
में अपनी-अपनी जाति 'नमः स्वाहा' आदि लगाकर अङ्गमन्त्र निष्पन्न करे । (ॐ
क्षां ज्ञानाय हृदयाय नमः, ॐ क्षीं ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा, ॐ क्षूं शक्त्यै शिखायै
वषट्, ॐ क्षैं बलाय कवचाय हुं, ॐ क्षः वीर्याय अस्त्राय फट्, ॐ क्षौं तेजसे
नेत्रत्रयाय वौषट्) इस प्रकार अङ्गमन्त्र निष्पन्न होते हैं ॥ ८-१० ॥
फिर 'ॐ नमो भगवते नारसिंहाय' इस द्वादशाक्षर मन्त्र से विग्रहवत् उनकी
पूजा करे । यह पूजा अङ्ग के सहित भीतर और बाहर सर्वत्र करे ॥ ११-१२ ॥
भगवदर्चाविधानम्
अथ लब्धाधिकारस्तु मन्त्रेणानेन दीक्षितः ।
भक्तिश्रद्धापरो नित्यं मतिमांश्छिन्नसंशयः ॥ १३ ॥
गुर्वाज्ञाभिरतो नित्यं तर्कवाग्जालवर्जितः ।
स्वकर्मनिरतो नित्यं वानप्रस्थोऽथवा गृही ॥ १४ ॥
पूर्वमनेन मन्त्रेण दीक्षितो भगवदाराधनं कुर्यादित्याह—अथेति सार्ध-
द्वाभ्याम् ॥ १३-१५ ॥
इस प्रकार अधिकार प्राप्त हो जाने पर इस मन्त्र की दीक्षा ग्रहण करे । दीक्षा
लेने पर आराधन विधि के लिये सर्वप्रथम स्नानादि नियम ग्रहण करे । साधक
शिष्य भक्ति एवं श्रद्धा में तत्पर रहे, बुद्धिमान बने, संशयालु न रहे, गुरु की
आज्ञा का पालन करे, तर्क रूप वाग्जाल से सर्वथा वर्जित रहे और अपने कर्म का
पालन करे ॥ १३-१४ ॥
मन्त्रमारधयेद् येन विधिना तं निशामय ।
उपार्ज्य भोगानखिलान् न्याय्योपायेन वै पुरा ॥ १५ ॥
स्नातो बद्धकचो मौनी शुद्धवासोऽर्घ्यपुष्पधृक् ।
कृत्वा द्वास्थ्यर्चनाद्यं तु उपविश्यासने ततः ॥ १६ ॥
तदाराधनविधिं दर्शयन् प्रथममाराधनसामग्रीसम्पादनम्, आराधकस्य स्नानादि-
नियमम्, द्वारदेवार्चनपूर्वकमासनोपवेशनं चाह—उपार्ज्येति सार्धेन । पाठक्रमादर्थ-
क्रमस्य बलीयस्त्वेन स्नानाद्यनन्तरमेव भोगोपार्जनमिति बोध्यम् । यद्वा, पुरा पूर्व-
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