सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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प्रायश्चित्त करने के बाद शिष्य का नख केशादि समस्त कर्तन करावे । पञ्च-
गव्य पिलावे और कुश जल से प्रोक्षण करे ॥ १२ ॥
वासुदेवादि के मन्त्रों का चार सौ जप करावे तथा चार दिन तक निरन्तर
चार सौ की संख्या में स्नान करावे । इस प्रकार सुधी आचार्य चार दिन तक मन्त्र
से शिष्य को स्नान करावे ॥ १३ ॥
अथवा प्रभातकाल से लेकर सायंकाल तक चार बार जल भर-भर कर चार
बार ब्रह्मतीर्थ का जल पिलावे ॥ १४ ॥
प्रायश्चित्त के अन्त में आचमन कर बीच-बीच में मन्त्राभिषिक्त जल पीते हुए
क्षीराज्यभावित भोजन उतना ही करे, जो न अधिक हो न कम हो । (भोजन की
विधि यह है कि आधा पेट अन्न से भरे, शेष एक भाग जल से तथा एक भाग
वायु सञ्चरण के लिये खाली रखे इसको अतृप्त अशन कहा जाता है) ॥ १५ ॥
अथवा चार रात एवं चार दिन केवल फल, मूल भोजन कर व्यतीत करे । यहाँ
तक भक्तिपूर्वक भगवत् शरणागतों के जीवन पर्यन्त दुष्कृत्यों का प्रायश्चित्त कहा गया
है । ब्रह्मकूर्च समेत यह सारा प्रायश्चित्त कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकारों
के दोषों का महत्त्व समझा कर पाप से विरत के लिए कहा गया है ॥ १६-१७ ॥
ज्ञात्वा महत्त्वं दोषाणां त्रिविधानां तु वै पुरा ।
सम्भवे सति हेमादिदानं सततमाचरेत् ॥ १८ ॥
दोषाधिक्ये हेमदानादिकमपि कार्यमित्याह—ज्ञात्वेति । त्रिविधानां कायिक-
वाचिकमानसानामित्यर्थः ॥ १८ ॥
यदि कायिक, वाचिक और मानसिक पाप अधिक हो, तब सुवर्णादि का
सतत् दान भी करे ॥ १८ ॥
पूर्वोक्ताद् विहितात् कालाल्लघुदुष्कृतिना क्रमात् ।
चतुर्थांशेन हासस्तु ब्रह्मकूर्चं पिबेत् ततः ॥ १९ ॥
दोषकाले पूर्वोक्तब्रह्मकूर्चप्रायश्चित्तकालस्य चतुर्थांशेन हासं कुर्यादित्याह—
पूर्वोक्तादिति । एवं ब्रह्मवर्णस्य सामान्यतः प्रायश्चित्तमुक्तम् ॥ १९ ॥
पूर्वोक्त काल में ब्रह्मकूर्च प्रायश्चित्त काल का चतुर्थांश कम कर देवे । इस
प्रकार केवल ब्राह्मण वर्ण के लिये सामान्य प्रायश्चित्त कहा गया ॥ १९ ॥
कालेन वर्णोत्कर्षेण सह सामान्यमुच्यते ।
प्रायश्चित्तं हि सर्वेषां सर्वकल्मषनाशनम् ॥ २० ॥
उत्तरोत्तरतां बुद्ध्वा प्रथमं दुष्कृतस्य च ।
क्षपयेत् तद् द्विजेन्द्रस्तु मासैर्द्वित्रिचतुर्गुणैः ॥ २१ ॥