सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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सन्तर्प्याथ तथा कुर्यात् सहस्रशतसंख्यया ॥ ३४ ॥
एकैकस्य तु वै होमं तिलैराज्यसमन्वितैः ।
दद्यात् पूर्णाहुतिं पश्चात् सर्वेषां तर्पणे कृते ॥ ३५ ॥
पुनरप्यर्चनं कुर्यादित्य वै मण्डलान्तरे ।
यथाक्रमेण सर्वेषां पुष्पधूपैस्तु केवलैः ॥ ३६ ॥
सकृद् ध्यानसमेतं तु चतुर्थाप्यथवाष्टधा ।
क्रमात् समस्तमन्त्राणां परावर्तनमाचरेत् ॥ ३७ ॥
सुशुभेनाक्षसूत्रेण स्वकैर्वा करपर्वभिः ।
ततोऽर्घ्यकुसुमैर्गन्धैः पूरयित्वा कराञ्जलिम् ॥ ३८ ॥
सर्वदेवमयं मन्त्रं स्मृत्वोच्चार्य च तं क्षिपेत् ।
सर्वत्र सर्वदानेन क्रमेणेष्ट्वा च भक्तितः ॥ ३९ ॥
प्रदर्श्य सर्वमन्त्राणामेकां मुद्रां च वैभवीम् ।
प्रणवेन सहस्रांशुसन्निभां सर्वसिद्धिदाम् ॥ ४० ॥
अथैतेषां वह्निमध्ये सन्तर्पणप्रकारं पुनर्मण्डलार्चनपूर्वकजपयज्ञविधिं पुष्पाञ्जलि-
समर्पणपूर्वकमुद्रादर्शनं चाह—प्राग्वत् सुसंस्कृते कुण्ड इत्यादिभिः ॥ ३२-४०॥
इसके बाद सुसंस्कृत कुण्ड में अग्नि का संस्कार कर उस अग्नि के मध्य में
समस्त मन्त्रों का यज्ञ की तरह न्यास करे ॥ ३२ ॥
प्रथम सात समिधाओं से यथाक्रम अग्निदेव का तर्पण करे । फिर मन्त्र से
पवित्र समस्त हवनान्त कर्म अलग कर करे ॥ ३३ ॥
अग्नि के मध्य में रहने वाले मन्त्र साधक के सम्मुख हो जाते हैं । अग्नि के
सन्तर्पण के पश्चात् एक लाख की संख्या में हवन करे और घी मिश्रित तिलों से
एक-एक मन्त्र द्वारा एक-एक आहुति देवे । इस प्रकार सभी देवताओं के तर्पण के
अनन्तर पश्चात् पूर्णाहुति देवे फिर अन्य मण्डल में आकर केवल पुष्प धूप से
यथाक्रम अर्चन करे ॥ ३४-३६ ॥
फिर उन मन्त्रों का एक बार, चार बार, अथवा आठ बार ध्यान कर उनका
परावर्त्तन करे । यह आवरण आवर्तन मनोहर कवलगट्टा से अथवा हाथ के पर्वों
से करे । फिर अर्घ्यपुष्प तथा गन्ध से कराञ्जलि पूर्ण कर, सर्वदेवमय मन्त्र का
स्मरण कर, उच्चारण करते हुए उसे ऊपर की ओर फेंक देवे । इस प्रकार
पुष्पाञ्जलि समर्पण कर सभी मन्त्रों की एक ही वैभवी मुद्रा प्रदर्शित करे । यह मुद्रा
सूर्य के समान तेजस्विनी है और सर्वसिद्धिप्रदा है । इसका प्रयोग प्रणव के साथ
करना चाहिये ॥ ३७-४० ॥