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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 837 में से

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पृष्ठ 253

१९४ सात्वतसंहिता
मिश्रित रोचना सहित कुङ्कुम से प्रतिमास षड्दलगर्भ वाले द्वादशार चक्र को लिखे।
उत्तर दिशा की वेदी में स्नान पीठ स्थापित करे। फिर आषाढ मास की शुक्ल
दशमी को सायङ्काल के समय वासुदेव मन्त्र से हाथ में जल ले कर,
'भगवन् पुण्डरीकाक्ष सर्वव्रतपतेऽच्युत।
व्रतं मे त्वत्प्रसादेन निष्पद्यतु तवाप्तये॥'
इस मन्त्र को पढ़कर संकल्प करे फिर जल प्रक्षिप्त कर देवे। तदनन्तर
एकादशी को उपवास करे, द्वादशी के दिन प्रातःकाल कर्णिका मध्य में वासुदेव
का और पूर्व, अग्नि एवं नैर्ऋत दलों में प्रदक्षिण क्रम से सङ्कर्षण, प्रद्युम्न तथा
अनिरुद्ध का अर्चन करे। ईशान, वायव्य तथा पश्चिम दिशा में संहार क्रम से
अनिरुद्ध, प्रद्युम्न तथा सङ्कर्षण का पूजन करे। फिर मध्य में वासुदेव की अर्चना
कर चक्र के पूर्व स्थित पहले अरे में वामन एवं प्रीति संज्ञक उनकी देवी का
हृन्मन्त्र और शिरो मन्त्र से, फिर श्रीधर एवं रति संज्ञक उनकी देवी का शिखा
मन्त्र और कवच मन्त्र से, फिर हृषीकेश एवं माया नामक उनकी देवी का अस्त्र
मन्त्र एवं नेत्र मन्त्र से क्रमशः अर्चन कर ध्यान करे। इस प्रकार अर्चन, स्नपन,
निवेदन, होम एवं जपादि से सबको सन्तुष्ट करे ॥ १४१-१५४ ॥
फिर श्रावण शुक्ल द्वादशी के दिन कर्णिका के मध्य में सङ्कर्षण का और उन
सङ्कर्षण के दलों में एवं सङ्कर्षण स्थान में वासुदेव का, अरों में पद्मनाभ, दामोदर
और केशव का तथा धी, महिमा और श्रीदेवी का, फिर ६ हृन्मन्त्रादि का अर्चन
करे। फिर भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को मध्य में प्रद्युम्न की, प्रद्युम्न स्थान में वासुदेव
की, अरों में नारायण, माधव, गोविन्द की तथा वागीश्वरी कान्ति और क्रिया, उनकी
तीनों देवियों की हृन्मन्त्रादि षटकों से पूजा करे। फिर आश्विन शुक्ल द्वादशी को
मध्य में अनिरुद्ध तथा अनिरुद्ध स्थान में वासुदेव की, अरों में विष्णु, मधु-सूदन,
त्रिविक्रम की तथा शक्ति, विभूति, छाया उनकी देवियों की हृन्मन्त्रादि षटकों से क्रम
से अर्चना करे। कार्तिक शुक्ल द्वादशी को कर्णिका के मध्य में वासुदेवादि मूर्त्ति
चतुष्टय की दलों पर हृन्मन्त्रादि षटकों से, अरों पर केशवादि द्वादश मूर्त्तियों की,
नेमि स्थान में द्वादश श्रियादि देवियों की यथाविधि विशेष रूप से अर्चना कर
होमपूर्वक पूर्णाहुति करे। हे सङ्कर्षण! यहाँ सविशेष किन्तु संक्षेप में यह व्रत कहा
गया है। जिसे सम्पादन करने पर मनुष्य फिर इस लोक में जन्म नहीं लेता। इस
प्रकार यहाँ चातुर्मास्य याग का विधान और फल कहा गया ॥ १५५-१६२ ॥
॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के समन्त्रकव्रतविधि
नामक अष्टम परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ ८ ॥
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