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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 316 में से

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पृष्ठ 90

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ८१ )
किञ्च वस्तुन सत्त्व स्वभाव असत्त्वं वेत्यादि प्रष्टव्यम् । न
तावदस्तित्वं वस्तुन स्वभाव इति समास्ति घटोऽस्तीत्यनयोः
पर्यायतया युगपत् प्रयोगायोगात् नास्तीति प्रयोगविरोधाच्च ।
एवमन्यत्रापि योज्यम् ॥ ५० ॥
एकान्त पक्षमें दूषणान्तर भी देते हैं-(किञ्चेति) वस्तुका स्वभाव सत्त्व है या असत्त्व है?
सत्त्व तो कह नहीं सकते क्योंकि "घटोऽस्ति" इत्यादि स्थलमें घटशब्द भी सत्त्वस्वभा-
वका बोधक है और अस्तिशब्द भी सत्त्वस्वभावका बोधक है अत दोनों पर्यायशब्द
होजायेंगे तो पर्यायशब्दको युगपत् एकत्र प्रयोग न होनेसे उक्त वाक्य ही अप्रमा-
णिक होगा । और “घाटो नास्ति” ऐसे प्रयोगका भी असम्भव होगा क्यों नास्ति-
शब्द अभावको कहता है घटशब्द सर्वथा भाववाची होनेसे भावाभाव दोनोंको एकत्र
स्थिति बाधित है । इसी प्रकार “स्याद् एक, स्यादनेक, स्यादेकोऽनेकश्च, स्यादवक्तव्यः
स्यादेकोवक्तव्य', स्यादनेकोऽवक्तव्यः स्यादनेकोऽवक्तव्य', स्यादेकोऽनेकश्चावक्तव्यः,
स्यान्नित्य', स्यादानित्य', इत्यादि सर्वत्र जानना चाहिये ॥ ५० ॥
यथोक्तम्—“घटोऽस्तीति न वक्तव्य सन्नेव हि यतो घट । ना-
स्तीत्यापि न वक्तव्यं विरोधात् सदसत्त्वयोः॥” इत्यादि ॥ ५१ ॥
(यथोक्तमिति) घट और अस्ति दोनोंका प्रयोग एक साथ नहीं कर सकते क्योंकि
घटका स्वरूप ही अस्तित्व है अर्थबोधनके लिये शब्दका प्रयोग कियाजाता है जब घट-
शब्दसेही अस्तित्वका बोध होगया । 'उक्तार्थानामप्रयोग' इस न्यायसे अस्तिशब्दका
प्रयोग व्यर्थ और अन्याय होगा । नास्तिशब्दका भी प्रयोग नहीं हो सकेगा
क्योंकि भाव और अभाव दोनों अत्यन्त विरुद्ध होनेसे एकत्र असम्भव है ॥५१॥
९ तस्मादित्यं वक्तव्यम्-सदसत्सदसदनिवर्चनीयवादभेदेन प्रतिवा-
दिनश्चतुर्विधाः । पुनरप्यनिर्वचनीयमतेनाऽमिश्रितानि सद्सदादि
मतानीति त्रिविधाः । तान् प्रति कि वस्तुवस्तीत्यादिपर्यनुयोगे
कथञ्चिदस्तीत्यादिप्रतिवचनसम्भवेन ते वादिन सर्वे निर्विण्णाः
सन्त तूष्णीमासत इति सम्पूर्णार्थविनिश्चायिन स्याद्वादमङ्गी-
कुर्वतस्तत्र तत्र विजय इति सर्वमुपपन्नम् ॥ ५२ ॥
उपसंहार' करते हैं-(तस्मादिति) चार प्रकारके वादी हैं एक पदार्थको सदा सत्
मानते हैं, दूसरे असत्, तीसरे सत् और असत् कहते हैं, चौथे न सत् कहते न असत्
कहते हैं किन्तु अनिर्वचनीय कहते हैं। उनमें अनिर्वचनीयपक्ष सिद्धान्ति सम्मत होनेसे
प्रथम तीनों प्रतिवादी रहजाते हैं। उनसे घटादि वस्तु है ? ऐसे पूछनेपर कथञ्चित् है ऐसा
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