सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ७३ )
पर्यन्त स्थित्यनुभाव बन्धहेतु है । प्रकृतिप्रदेशका बन्धहेतु योग है प्रकृति बन्ध
स्थिति, अनुभाव, प्रदेशभेदसे बन्ध चार प्रकार है ॥ ३६ ॥
बन्धश्चतुर्विध इत्युक्तम्, प्रकृतिस्थित्यनुभावप्रदेशास्तु तद्विधय
इति । यथा निम्बगुडादेस्तिक्तत्वमधुरत्वादिश्वभावः एवमावरणी-
यस्य ज्ञानदर्शनावरणत्वमादित्यप्रभोच्छेदकाम्भोधरवत् प्रदीप-
प्रभातिरोधायककुम्भवच्च सदसद्वेदनीयस्य सुखदुःखोत्पाद-
कत्वमसिधारामधुलेहनवद्दर्शनमोहनीयस्य तत्त्वार्थाश्रद्धानका-
रित्वं दुर्जनसङ्गवच्चारित्रे मोहनीयस्यासंयमहेतुत्वं मद्यमदवदा-
युषो देहबन्धकर्तृत्वं जलवत् नाम्नो विचित्रनामकारित्वं चित्र-
कवद्गोत्रस्योच्चनीचकारित्व कुम्भकारवद्दानादीनां विघ्ननिदान-
त्त्वमन्तरायस्य स्वभावः कोशाध्यक्षवत् । सोऽयं प्रकृतिबन्धोऽ-
ष्टविधः, द्रव्यकर्मावान्तरभेदमूलप्रकृतिवेदनीय । तथाचोदुमा-
स्वातिवाचकाचार्य्य 'आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीया-
युर्नामगोत्रान्तराया 'इति । तद्भेदश्च समगृह्णात् पञ्चनवद्व्यष्टाविंश-
तिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चदशभेदा यथाक्रममिति । एतच्च सर्व
विद्यानन्दादिभिर्विवृतमिति विस्तरभयान्न प्रस्तूयते ॥ ३७ ॥
बन्धके चार भेद हैं-प्रकृति स्थिति, अनुभव और प्रदेश, प्रकृतिका, अर्थ स्वभाव है जिस
: प्रकार निम्ब ओर गुडका तिक्त और मधुर स्वभाव है उसी प्रकार अर्थका तिरोधान
: करना ज्ञानावरणका स्वभाव है जैसे मेघ सूर्यकी प्रभाको आच्छादन करता है वैसे ही
: ज्ञानावरण अर्थका तिरोधान करता हे जिस भाँति घटादि दीपप्रभाको तिरोधान
: करता है उसी भाँति दर्शनावरण वस्तुको अप्रकाशित करता है मधुलिप्त तलवारकी
: धार जिस प्रकार सुख और दुःख दोनोंको उत्पन्न करती है उसी प्रकार सदसद्रूपवेद्य
: सुख ओर दुःख दोनोंको उत्पन्न करता है दुर्जनोंका संग जिस प्रकार सदाचारसे
: श्रद्धाको हटादेताहै उसी प्रकार दर्शन मोहन तत्त्वार्थमे अश्रद्धा उत्पन्न करदेते हैं ।
: यह आठ प्रकारका बन्ध द्रव्य कर्मके अवान्तर मूल प्रकृति वेदनीय है प्रसंगवश
: बन्ध और उसके भेदमे प्रमाण कहते है ( जाद्यो ज्ञानदर्शनेत्यादि ) मूलप्रकृति-
: बन्धके आठों भेदोंके अनन्तर उत्तर प्रकृतिबन्धके भेद कहते हैं-( पञ्चनवेत्यादि )
: पाँच प्रकार ज्ञानावरणीय, नौ प्रकार दर्शनावरणीय, दो प्रकार वेदनीय २८ प्रकार