सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 316 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 76

दर्शनम् ] . भाषाटीकासमेत. । ( ६७ )
भिन्नः कथञ्चन । ज्ञानं पूर्वापरीभूतं सोऽयमात्मेति
कीर्तितः ॥" इति ॥ २८ ॥
( तदुक्तमिति ) ज्ञानसे अत्यन्त भिन्न या अत्यन्त अभिन्न आत्मा नहीं है किन्तु
भिन्नाभिन्न अर्थात् पूर्वापरोभूत ज्ञानको आत्मा कहते हैं ॥ २८ ॥
'ननु भेदाभेदयोः परस्परपरिहारेणावस्थानादन्यतरस्यैव वास्त-
वत्वादुभयात्मकमयुक्तमिति चेत्तदयुक्तम्, बाधे प्रमाणाभावात्।
अनुपलम्भो हि बाधकं प्रमाणं न सोऽस्ति समस्तेषु वस्तुष्वने-
करसात्मकत्वस्य स्याद्वादिनो मते सुप्रसिद्धत्वादित्यलम् ॥ २९ ॥
भेदाभेदका विरोधाभाव समर्थन-( ननु इत्यादि ) यथा घटसे भिन्न पट है
घटमें पटका भेद अर्थात् अभाव है तहा घट नहीं रहसकता अभेद अर्थात्
भेदाभाव घटमें पटका भेदाभाव पटरूपता है तथा च भेदाभेद परस्पर विरुद्ध होनेसे
एकत्र नहीं रह सकते । नैयायिकोंने भी भेदका प्रतियोगितावच्छेदकके साथ
और अभावका प्रतियोगीके साथ विरोध माना है अतः परस्पर विरुद्ध होनेसे एकको
सत्यत्व और अन्यको मिथ्यात्व कहनाहोगा । उत्तर(तदयुक्तमिति ) सहानवस्थान
लक्षण ही विरोध है विरोध होनेपर बाध्यबाधकभाव होता है बाधमें कोई प्रमाण ही
नहीं घट जहापर है वहा घटाभाव उपलब्ध नहीं होता न घटाभाव व्यवहार भी नहीं
होता है अत अनुपलब्धरूप ही प्रमाण कहोगे सो भी ठीक नहीं क्योंकि स्याद्
वादियोंके मतमें समस्तवस्तुओंमें अनेकान्तात्मक अर्थात् ( स्यादस्ति स्यान्नास्ति )
इत्यादि अनिश्चयात्मक रहता है अतः आर्हत् मतमें कोई विरोध ही नहीं ॥ २९ ॥
अपरे पुन जीवाजीवयोरपरं प्रपञ्चमाचक्षते जीवाकाशधर्माधर्म-
पुद्गलास्तिकायभेदात् । एतेषु पञ्चसु तत्त्वेषु कालत्रयसम्ब-
न्धितया स्थितिव्यपदेशः, अनेकप्रदेशत्वेन शरीरवत् कायव्य-
पदेशः । तत्र जीवा द्विविधाः, संसारिणो मुक्ताश्च । भवाद्भवा-
न्तरप्राप्तिमन्त संसारिण । ते च द्विविधा , समनस्का अमन-
स्काश्च । तत्र संज्ञिनः समनस्का , शिक्षाक्रियालापग्रहणरूपा
संज्ञा, तद्विधुरास्त्वमनस्काः । ते चामनस्का द्विविधा , त्रस-
स्थावरभेदात् । तत्र द्वीन्द्रियादय शङ्खगण्डोलकप्रभृतयश्चतु-
र्विधास्त्रसाः ॥ ३० ॥