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सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 316 में से

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पृष्ठ 35

( २० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध-
तदुक्तम्- "वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्म्मण्यस्ति तयोः फलम् ।
चर्मोपमश्चेत् सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलः" इति ॥ १७ ॥
उसी को कहते हैं- "वर्षातपाभ्यामित्यादि" वर्षाका फल है आर्द्र करना आतपका फल
है शुष्क करना यह दोनो निर्विकार ( नित्य ) आकाशमें नहीं हो सकते आकाश न भी-
जता है न सूखता है उक्त दोनों फल चर्मम होते हैं क्योंकि यह विकारी है । इस
प्रकार वस्तुको चर्मके समान मानो तो विकारी होनेसे अनित्य हो जायगा । आकाशके
समान निर्विकार मानो तो सहकारी भी निष्फल हो जायगा ॥ १७ ॥
अथ भावस्तै सहकारिभिः सहैव कार्यं करोतीति स्वभाव
इति चेत् अस्तु तर्हि सहकारिणो न जह्यात् प्रत्युत पलायमाना-
नपि गले पाशेन बद्ध्वा कृत्य कार्यं कुर्यात् स्वभावस्यान-
पायात् । किञ्च सहकारिजन्योऽतिशयः किमतिशयान्तरमार-
भते न वा ? उभयथापि प्रागुक्तदूषणपाषाणवर्षणप्रसङ्गः ॥१८॥
यदि कहो वस्तुका स्वभाव ही ऐसा है जो सहकारीके साथ ही कार्य करता है हे
आयुष्मन् ! फिर तो सहकारीको छोडगा ही नहीं प्रत्युत भागता हो तो गलेमें रस्सी बाधकर
कार्य करावेगा । क्योकि स्वभावका त्याग नहीं होता है स्वभावनाश होनेसे स्वरूप का भी
नाश होगा । और भी दूषण देते हैं- "किञ्चेति" क्या सहकारीसे उत्पन्न अतिशय अतिश-
यान्तरको उत्पादन करता है या नहीं ? दोनों पक्षमें उपकारकत्व पक्षम उक्त दूषणपाषाणकी
महावृष्टि होगी । अर्थात् यदि अतिशयको न आरम्भ करे तो अकिञ्चित्कर होगा यदि
अतिशयान्तरको आरम्भ करे तो क्या वह अतिशय पूर्व अतिशयसे भिन्न है या अभिन्न ?
भेदपक्षमें पूर्वातिशय व्यर्थ है इत्यादि अभेदपक्षमे दूषण आगे चलकर मिलेगा ॥१८॥
अतिशयान्तरारम्भपक्षे बहुमुखानवस्थादौस्थ्यमपि स्यात् ।
अतिशये जनयितव्ये सहकार्यन्तरापेक्षायां तत्परम्परापात
इत्येकानवस्था आस्थेया । तथाहि-सहकारिभिः सलिलपवना-
दिभि पदार्थसार्थैराधीयमाने बीजस्यातिशये बीजमुत्पादक-
मभ्युपेयम् । अपरथा तदभावेऽप्यतिशयः प्रादुर्भवेत् बीजञ्चाति-
शयमादधान सहकारिसापेक्षमेवाधत्ते । अन्यथा सर्वदोपकारा-
पत्तौ अङ्कुरस्यापि सदोदयः प्रसज्येत । तस्मादतिशयार्थमपे-
क्षमाणैः सहकारिभिरतिशयान्तरमाधेय बीजे तस्मिन्नप्युपकारे