सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 292, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( २८५ )
तस्या अविद्यायाः क्लेशादिबीजत्वानुपपत्तेः विवेकख्यातिपूर्व-
कसर्ववृत्तिसम्पन्नायास्तस्यास्तथात्वाप्रसङ्गाच्च ॥ ४० ॥
अविद्या पद समस्त है इसमे तीन समास हो सकते है विद्याया अभाव यह
अव्ययीभाव समास है इसमे पूर्वपद ( नञ् अ ) का अर्थ प्रधान रहता है यथा
अमक्षिकम् । दूसरा न विद्या अविद्या यह तत्पुरुष है इसमे उत्तरपद ( विद्या ) का
अर्थ प्रधान रहता है यथा राजपुरुषादि । तृतीय न विद्या यस्य यस्मिन् वा यह
बहुव्रीहि है इसमें अन्यपद ( यस्य ) का अर्थ प्रधान रहता हे यथा अमक्षिक देश
इत्यादि । प्रकृतमें तीनोंमेंसे क्या विवक्षित है ? प्रथमपक्षमें अभाव प्रधान होनेसे अभा-
वको क्लेशादिजनकत्व अनुपपन्न होगा अव्ययीभाव समास नियमसे अव्यय होनेमे
अविद्या पदमें स्त्रीलिङ्गत्वभी अनुपपन्न होगा । यत्किञ्चित् प्रतियोगिक अभावविशिष्ट
अविद्या क्लेशादिके विरोधी होनेसे क्लेशादिका कारणत्व असम्भव होनेके कारण द्वि-
तीयभी नहीं कह सकते । तृतीय पक्षमेंभी नञोऽस्त्यर्थानाम् इति वार्तिकनलसे अवि-
द्यमान है विद्या जिस बुद्धिकी ऐसा विग्रह कर विद्यमानपदका लोप करनेसे अविद्या
पदसेही समाधि बोधित होगा । पुनः अविद्याको क्लेशादिजनकत्व असम्भव है विवेक
ख्यातिपूर्वक सर्ववृत्तिसम्पन्न अविद्या उस प्रकार होभी नहीं सकती है ॥ ४० ॥
उक्तञ्च-अस्मितादीना क्लेशानामविद्यानिदानत्वम् 'अवि-
द्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्' इति । तत्र
प्रसुप्तत्वं प्रबोधसहकार्याभावेनानभिव्यक्ति, तनुत्वं प्रतिपक्षभा-
वनया शिथिलीकरणं, विच्छिन्नत्वं बलवता क्लेशेनाभिभवः,
उदारत्वं सहकारिसन्निधिवशात् कार्यकारित्वम् । तदुक्तं वाच-
स्पतिमिश्रेण व्यासभाष्यव्याख्यायाम् "प्रसुप्तास्तत्त्वलीनानां
तनुदग्धाश्च योगिनाम् । विच्छिन्नोदाररूपाश्च क्लेशा विषयस-
ङ्गिनाम् ॥" इति ॥ ४१ ॥
अविद्याक्षेत्रत्वमुत्तरेषामित्यादि अस्मितादिको अविद्यामूलत्व कहा हे प्रबोधका
सहकारी न होनेसे अनभिव्यक्ति प्रसुप्तत्व है प्रतिपक्षभावनासे शिथिलीकरण तनुत्व
है प्रबलक्लेशसे अभिभव विच्छिन्नत्व है सहकारीके सन्निधानसे कार्यकारित्व उदारत्व
है वाचस्पतिमिश्रनेभी व्याख्यान किया है तत्त्वमें लीनोंके लिये प्रसुप्त योगि-
योंके लिये तनुदग्ध है क्लेश अविषयसङ्गियोंके लिये विच्छिन्न उदाररूप है
इति ॥ ४१ ॥