सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 272, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २६६ )
कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि सम्बन्ध-
स्तत्कृतः सर्गः ॥ ” इति ॥ १६ ॥
जिस प्रकार व्यापारशून्य अयस्कान्त (चुम्बक) के संयोगसे लोहेमें व्यापार होता
है तिसी प्रकार निर्व्यापार पुरुषके सन्निधानसे प्रधानमे व्यापार उत्पन्न होता है ।
प्रकृतिपुरुषका सम्बन्धभी पंगु और अन्धेके सम्बन्धवत् परस्पर प्रयोजनसे होता है
प्रकृति भोग्य होनेसे भोक्ता पुरुषकी अपेक्षा करती है । बुद्धि प्रतिबिम्बित
होनेसे भेदज्ञान न होनेके कारण पुरुषभी दुःखत्रयनिवारणार्थ कैवल्यकी
अपेक्षा करते हैं । कैवल्य प्रकृतिपुरुषविवेकनिबन्धन है उसके बिना नहीं हो
सक्ता यथा एक अंध और एक पंगु दोनों साथही राजमार्गसे जा रहे दैव-
दुर्विपाकसे मार्ग छुट गया अनन्तर भयसे इतस्ततः घूमते हुये भाग्यवश दोनों
मिलगये पुनः दोनों सम्मति कर अन्धने पंगुको अपने कन्धेपर चढालिया ओर
पंगुके दिखाये मार्गसे अन्ध अपने स्थानपर पहुंच गया पंगुभी कन्धेपर चढकर
स्वस्थान पहुंचा इस प्रकार परस्परापेक्ष प्रधान पुरुष निमित्त सृष्टि होती है । पुरुषके
दर्शनार्थ तथा कैवल्यार्थ प्रधानकी प्रवृत्ति है पंगु अन्धवत् दोनोंका सम्बन्ध है एत-
न्मूलही सृष्टि है ॥ १६ ॥
ननु पुरुषार्थनिबन्धना भवतु प्रकृतेः प्रवृत्ति निवृत्तिस्तु कथमुपप-
द्यत इति चेदुच्यते यथा भर्त्रा दृष्टदोषा स्वैरिणी भर्त्तारं पुन-
र्नोपैति यथा वा कृतप्रयोजना नर्त्तकी निवर्त्तते तथा प्रकृता-
रपि ॥ यथोक्तम्- “रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्त्तते नर्त्तकी यथा
नृत्यात् । पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाश्य विनिवर्त्तते प्रकृतिः ॥ ”
इति । एतदर्थे निरीश्वरसाङ्ख्यशास्त्रप्रवर्त्तककपिलानुसारिणां
मतमुपन्यस्तम् ॥ १७ ॥
इति सर्वदर्शनसंग्रहे सांख्यदर्शनं समाप्तम् ॥ १४ ॥
पुरुषार्थ निमित्त प्रधानकी प्रवृत्ति हो परन्तु निवृत्ति कैसे हो सकती है, सो कहते
हैं जिस प्रकार जिसके दोष पतिने देखे हैं ऐसी व्यभिचारिणी स्त्री पुनः पतिके पास
नहीं जाती है यथा वा नृत्य समाप्त होनेसे नर्तकी रङ्गस्थानमे निवृत्त होती है तिसी
प्रकार प्रकृतिभी कृतकृत्य होकर निवृत्त होती है इस विषयमें निरीश्वर सांख्यशास्त्र-
प्रवर्त्तक कपिलका मत मैंने दिखाया ॥ १७ ॥
इति सर्वदर्शनसंग्रहमें सांख्यदर्शन समाप्तम् ।