सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 258, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २५१ )
यदि समस्तशब्दोंका सत्ताही अर्थ हो तो सब पर्याय होनेसे अनेक शब्दोंका
प्रयोगही असंगत होगा । अभियुक्तोंनेभी कहा है पर्याय शब्दोंका युगपत् प्रयोग इष्ट
नहीं है । यतः पर्याय ( एक-एक ) अर्थके बोधक होते हैं मिलकरके नहीं होते हैं
अतः यह पक्ष विचार योग्यभी नहीं है ॥ २७ ॥
तदेतद्गगनरोमन्थकल्पं नीललोहितपीताद्युपरञ्जकद्रव्यभेदेन
स्फटिकमणेरिव सम्बन्धिभेदात् सत्तायास्तदात्मना भेदेन
प्रतिपत्तिसिद्धौ गोसत्तादिरूपगोत्वादिभेदनिबन्धनव्यवहारवैल-
क्षण्योपपत्तेः । तथाचाप्तवाक्यम्-“स्फटिकं विमलं द्रव्यं यथा-
युक्तं पृथक् पृथक् । नीललोहितपीताद्यैस्तद्वर्णमुपल-
भ्यते ॥ ” इति ॥ २८ ॥
यहभी आकाशचर्वणके समान है क्योंकि नीलपीतादि वस्तुके सन्निधानमें जिस
प्रकार नीलपीतादिरूप भासित होता है तिसी प्रकार व्यञ्जकध्वनिभेद होनेसे सत्ताभी
उसके साथ भिन्न होकर गोसत्तारूप गोत्वादि व्यवहार वैलक्षण्य हो जाते हैं ।
आप्तवाक्यभी है कि जिस प्रकार निर्मल स्फटिक नील, लोहित, और पीतादि
उपरञ्जक भेदसे तत्तद्वर्ण प्रतीत होता है तिसी प्रकार व्यञ्जकवर्णभेदसे सत्ताजा-
तिभी भिन्न २ रूप प्रतीत होती है ॥ २८ ॥
तथा हरिणाप्युक्तम्-“सम्बन्धिभेदात् सत्तैव भिद्यमाना गवा-
दिषु । जातिरित्युच्यते तस्यां सर्वे शब्दा व्यवस्थिताः ॥
तां प्रातिपदिकार्थं च धात्वर्थं च प्रचक्षते । सा सत्ता सा महा-
नात्मा तामाहुस्त्वतलादयः ॥” इति । आश्रयभूतैः सम्बन्धि-
भिर्भिद्यमाना कल्पितभेदा गवाश्वादिषु सत्तैव महासामान्य-
मेव जातिः । गोत्वादिकमपरं सामान्यं परमार्थतस्तत्तो भिन्नं
न भवति । गोसत्तैव गोत्वं नापरमन्वायि प्रतिभासते । एवम-
श्वसत्ता अश्वत्वमित्यादि वाच्यम् ॥ एवञ्च तस्यामेव गवादि-
भिन्नायां सत्तायां जातौ सर्वे गोशब्दादयो वाचकत्वेन व्यव-
स्थिताः प्रातिपदिकार्थश्च सत्तेति प्रसिद्धम् । भाववचनो धातु
रिति पक्षे भावः सत्तैवेति धात्वर्थः सत्ता भवत्येव क्रियावचनो