सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 252, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २४५ )
ज्ञानपूर्वकानुष्ठानसे फलप्रद ( रोरवीति ) शब्द करता है शब्दपदसे प्रपञ्च विवक्षित है
महादेवका अर्थ शब्दहै मनुष्योंमें प्रवेश किया महादेव परब्रह्मके साथ साम्य होनेके
लिये अथवा जगत्का कारण स्फोटाख्य नित्यशब्द ब्रह्म है ॥ १४ ॥
हरिणाभाणि ब्रह्मकाण्डे-“अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यद-
क्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥” इति ॥ १५॥
अनादिनिधन अक्षराख्य शब्दतत्त्व ब्रह्म घटादि अर्थाकार विवर्त होता है जिससे
जगत्प्रक्रिया निष्पन्न होती है । तत्त्वतो अन्यथाभाव न होना विवर्त हे यथा रज्जुमें
सर्प ॥ १५ ॥
ननु नामाख्यातभेदेन पदद्वैविध्यप्रतीते कथं चातुर्विध्यमुक्त-
मिति चेन्नैव प्रकारान्तरस्य प्रसिद्धत्वात् । तदुक्तं प्रकीर्णके ।
“द्विधा कैश्चित् पदं भिन्नं चतुर्द्धा पञ्चधापि वा । अपोद्धृत्यैव
वाक्येभ्य प्रकृतिप्रत्ययादिवत् ॥ ” इति ॥ १६ ॥
नामका अर्थ प्रातिपदिक है उपसर्गनिपातभी प्रातिपदिक होनेसे यद्यपि नामा-
ख्यात दो पद है तथापि प्रकारान्तरसे चातुर्विध्य प्रसिद्ध है । वाक्यसे पृथक् करके
प्रकृति प्रत्ययविभागके समान पदभी किसी २ ने दो प्रकार किसी २ ने चार
प्रकार और किसी २ ने पाँच प्रकार पद माने हैं ॥ १६ ॥
कर्मप्रवचनीयेन वै पञ्चमेन सह पदस्य पञ्चविधत्वमिति हेला-
राजो व्याख्यातवान् कर्मप्रवचनीयास्तु क्रियाविशेषोपजनित-
सम्बन्धावच्छेदहेतव इति सम्बन्धविशेषद्योतनद्वारेण क्रियावि-
शेषद्योतनादुपसर्गेष्वेवान्तर्भवतीत्यभिसन्धाय पदचातुर्विध्यं
भाष्यकारेणोक्तं युक्तमिति विवेक्तव्यम् ॥ १७ ॥
कर्मप्रवचनीयसंज्ञा मिलाकर पञ्चमत्व हेलाराजने कहा है कर्मप्रवचनीय क्रिया-
विशेषसम्बन्धद्योतक होनेसे परंपरया क्रियाविशेष द्योतन होगया अत उपसर्गहीमें
अन्तर्भूत होनेके कारण भाष्यकारने चार प्रकार कहा है ॥ १७ ॥
ननु भवता स्फोटात्मा नित्य. शब्द इति निजागद्यत तन्न
मृष्यामहे तत्र प्रमाणाभावादिति केचित् ॥ अत्रोच्यते, प्रत्य-
क्षमेवात्र प्रमाणम्, गौरित्येकं पदमिति नानावर्णातिरिक्तकपदा-