सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( १८९ )
प्रेक्षावान् मूषिकविषाणं प्रतिषेद्धुं यतते । ततश्चानुपपत्तेर्नो
नियम इति चेन्मैवं मंस्थाः सप्तमतया प्रमिते अन्धकारादौ
भावत्वस्य भावतया प्रमिते शाक्तसख्यादौ सप्तमत्वस्य च
निषेधादिति कृतं विस्तरेण ॥ ५ ॥
यद्यपि अभावको लेकर सात पदार्थ होनेसे छःका कथन अयुक्त है तथापि नञर्थ
रहित भावरूप पदार्थ छ ही हैं ऐसे अभिप्रेत होनेसे अनुपपत्ति नही होगी अस्तु
तथापि छःही है ऐसा नियम नहीं हो सकता क्योकि नियमसे व्यावर्तनीय ( हटाने
योग्य ) सप्तम अष्टमादि पदार्थ प्रसिद्ध है या अप्रसिद्ध है ? प्रसिद्ध है तो निषेध
नहीं हो सकता । यदि अप्रसिद्ध मानो तो सुतरां निषेध व्यर्थ है । कोई बुद्धिमान्
मूषिकशृङ्गका निषेध नही करते अप्रसिद्ध प्रतियोगिक अभावभी नहीं मानते एवञ्च
उभयतः पाशारज्जु न्यायवत् नियम अनुपपन्न है तथापि सप्तमत्वेन प्रसिद्ध अन्ध-
कारमें भावत्व एवं भावत्वेन प्रसिद्ध शक्तिसादृश्यादिमें सप्तमत्वके व्यावर्तनार्थ नियम
चरितार्थ होता है ॥ ५ ॥
तत्र द्रव्यादित्रितयस्य द्रव्यत्वादिजातिलक्षणम् । द्रव्यत्वं नाम
गगनसमवेतत्वे सत्यरविन्दसमवेतत्वे सति नित्यत्वे सति
गन्धासमवेतत्वम् । गुणत्वं नाम समवायिकारणासमवायिका-
रणभिन्नसमवेतसत्तासाक्षाद्व्याप्यजाति । कर्मत्व नाम नित्य-
समवेतत्वसहितसत्तासाक्षाद्व्याप्यजाति । सामान्यं तु प्रध्वंस-
प्रतियोगित्वरहितमनेकसमवेतम् । विशेषो नामान्योऽन्याभाव-
विरोधिसामान्यरहितः समवेत । समवायस्तु समवायरहित-
सम्बन्ध इति षण्णां लक्षणानि व्यवस्थितानि ॥ ६ ॥
द्रव्य, गुण, कर्मका लक्षण द्रव्यत्वादि जातिमत्त्व है आकाशमें समवेत हो अरविन्दमे
समवेत हो नित्य हो और गन्धमें आवृत्ति हो वही द्रव्यत्व है समवायिकारण अस-
मवायि कारणसे भिन्न जो ज्ञानेच्छादि उसमे समवेन सत्ताका साक्षात् व्याप्य जाति-
मत्त्व गुणत्वका लक्षण है । कर्मत्वका लक्षण नित्य समवेतत्वसहित सत्ताका साक्षात्
व्याप्यजातित्व है । सामान्यका लक्षण ध्वसके अप्रतियोगी अनेक वस्तुओंमें समवाय
सम्बन्धसे वर्तमान है । अन्योन्याभावविरोधी सामान्यसे शून्य समवेत विशेष
पदार्थ है समवायरहित सम्बन्धविशेष समवाय हे ॥ ६ ॥