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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 316 में से

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पृष्ठ 183

( १७६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ प्रत्यभिज्ञा-

नन्वात्मन परमेश्वरत्व स्वाभाविक चेन्मार्थ प्रत्यभिज्ञाप्रार्थ-
नया न हि वीजमप्रत्यभिज्ञातं सति सहकारिसाकल्ये अंकुर
नोत्पादयति । तस्मात् कस्माद्वात्मप्रत्यभिज्ञाने निर्बन्ध इति
चेत् ॥ १६ ॥
यदि आत्माका परमेश्वरत्व धर्म स्वाभाविक हे तो प्रत्यभिज्ञाकी प्रार्थना निष्फल हे
क्योंकि पृथिवी जलादि सहकारीके संयोग होनेपरभी प्रत्यभिज्ञा न होनेके कारण
बीज अंकुरको नहीं उत्पादन करेगा ऐसा कोई नियम नहीं दृष्ट होता हे अत-
प्रत्यभिज्ञाका निर्बन्धमें क्या हेतु हे ॥ १६ ॥
उच्यते । श्रृणु तावदिदं रहस्यं, द्विविधा ह्यर्थक्रिया वाह्यांकु-
रादिका प्रमातृविश्रान्तिचमत्कारसारा प्रीत्यादिरूपा च ।
तत्राद्या प्रत्यभिज्ञानं नापेक्षते, द्वितीया तु तदपेक्षत एव ।
इहाप्यहमीश्वर इत्येवम्भूतचमत्कारसारा परापरसिद्धिलक्षण-
जीवात्मैकत्वशक्तिविभूतिरूपार्थक्रियेति स्वरूपप्रत्यभिज्ञान-
मपेक्षणीयम् ॥ १७ ॥
इसका रहस्य सुनो अर्थ क्रिया वाह्य आन्तरभेदसे दो प्रकार हे अङ्कुरादि
काय वाह्य हे उसमे प्रत्यभिज्ञाकी अपेक्षा नहीं । द्वितीय प्रमाताका विश्रामका
चमत्कार प्रधान प्रीतिरूप हे इसमें प्रत्यभिज्ञाकी अपेक्षा होती हे यहामी में ईश्वर
हू इत्यादि चमत्कारसार परापर सिद्धिलक्षण जीवात्मैकत्व शक्तिविभूतिरूप कार्य हे
अतः स्वरूपप्रत्यभिज्ञान अवश्य चाहिये ॥ १७ ॥
ननु प्रमातृविश्रान्तिसारार्थक्रिया प्रत्यभिज्ञानेन विना दृष्टा
सती तस्मिन् दृष्टेति क दृष्टम् । अत्रोच्यते, नायकगुणगणसं-
श्रवणप्रवृद्धानुरागा काचन कामिनी मदनविह्वला विरहक्लेशम-
सहमाना मदनलेखावलम्बनेन स्वावस्थानिवेदनानि विधत्ते
तथा वेगात् तन्निकटमटत्यपि तस्मिन्नवलोकितेऽपि तदवलो-
कन तदीयगुणपरामर्शाभावे जनसाधारणत्वं प्राप्ते हृदयङ्गम-
भाव न लभते । यदा तु मूर्त्तिवचनात् तदीयगुणपरामर्शं