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सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 316 में से

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पृष्ठ 179

( १७२ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ प्रत्यभिज्ञा-
वशादस्मिन्दृष्टेऽप्यनुपलक्षिते । शक्त्याविष्करणेनेयं प्रत्यभि-
ज्ञोपदर्श्यते'॥तथाहि--"सर्वेषामिह भूतानां प्रतिष्ठाजीवदाश्रया।
ज्ञानं क्रिया च भूतानां जीवतां जीवनं मतम्॥ तत्र ज्ञानं स्वत
सिद्धं क्रिया कर्त्राश्रिता सती । परैरप्युपलक्ष्येत तयान्यज्ज्ञा-
नमुच्यते"॥ इति ॥ या चैषां प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता ।
अक्रमानन्दचिद्रूप प्रमाता स महेश्वर ॥ " इति च ॥१०॥
उक्तार्थमें उदयकरपुत्रकी सम्मतिभी कहते हैं आदिसिद्ध महेश्वर ज्ञाता तथा
कर्त्ता आत्मामें कर्तृत्व ईश्वरत्वादिको कौनसा अजडात्मा अर्थात् बुद्धिमान् निषेध
और विधान करेगा अर्थात् सिद्धका निषेध नहीं हो सकता है एव विधानभी व्यर्थ
है तथापि स्वयंप्रकाशकतया प्रत्यक्षदर्शन होनेपरभी अविद्यावश अनुपलक्षित
( अप्रत्यक्ष ) आत्मामें शक्तिके आविर्भावार्थ प्रत्यभिज्ञाशास्त्रका उपदेश करते हैं
सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रतिष्ठा जीवनके आधीन है ज्ञान और क्रिया जीनेवालोंका
जीवन है उनमें ज्ञान स्वत सिद्ध है क्रिया कर्तामें आश्रित होनेसे अन्यकोभी उप-
लक्षित ( प्रतीत ) होता हे ज्ञान दूसरेके उपलक्षित नहीं होता है आत्माकी प्रतिभा
तत्तत्पदार्थके कर्माधीन है अर्थात् जिस कालमें अन्त करणवृत्ति यदाकार परिणत
होगी उसकी प्रतिभा होगी महेश्वरका ज्ञान सदा प्रकाशित रहनेसे अक्रम आनन्द
चिद्रूप और ज्ञाता है ॥ १० ॥
सोमानन्दनाथपादैरपि-“सदा शिवात्मना वेत्ति सदा वेत्ति सदा-
त्मना " इत्यादि ॥ ज्ञानाधिकारपरिसमाप्तावपि-“ तदैक्येन
विना नास्ति संविदा लोकपद्धति । प्रकाशैक्यात्तदेकत्वं मा-
तैकः स इति स्थित ॥ स एवार्थभृशत्वेन नियतेन महेश्वर ।
विमर्श एव देवस्य शुद्धे ज्ञानाक्रियेयतः॥” इति॥विवृतं चाभिन-
वगप्ताचार्यै । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमि
दंविभातीतिश्रुत्या प्रकाशं चिद्रूपमहिम्ना सर्वस्य भानजातस्य
भासकत्वमभ्युपेयते । ततश्च विषयप्रकाशस्य नीलप्रकाश
पीतप्रकाश इति विषयोपरागभेदाद्भेदः । वस्तुतस्तु देशका-