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सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 316 में से

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पृष्ठ 177

( १७० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ प्रत्यभिज्ञा-
ज्ञापमी नहीं है । अतएव अक्षपादने कहा है कि 'जिस उद्देश्यसे प्रवृत्त हो वही
फल है ॥ ६ ॥
उपशब्द सामीप्यार्थ । तेन जनस्य परमेश्वरसमीपताकरण-
मात्रं फलम् । अतएवाह समस्तेति, परमेश्वरतालाभे हि सर्वा
सम्पदस्तन्निष्यन्दमय्य सम्पन्ना एव रोहणाचललाभे रत्नसम्पद्
इव। एव परमेश्वरतालाभे किमन्यत् प्रार्थनीयम् । तदुक्तमुत्पला
चार्यैः-“भक्तिलक्ष्मीसमृद्धाना किमन्यदुपयाचितम् । एनया
वा दरिद्राणां किमन्यदपयाचितम् ॥ ” इति ॥ ७ ॥
उपशब्द सामीप्यार्थक है इससे परमेश्वरकी समीपताकरणमात्रही फल सूचित
किया । अतएव कहा है कि (समस्तसपत्समवाप्ति इति ) जिस प्रकार रोहण पर्वतपर
चढनेसे रत्नसम्पत्ति प्राप्त होती हैं उसी प्रकार महेश्वरप्राप्तिसे समस्त सम्पत्तियें
प्राप्त होजाती है । अतएव उत्पलाचार्यने कहा है भक्तिरूपी लक्ष्मीसे सम्पन्नोंको
याचनीय अन्य वस्तु क्या है अर्थात् कुछभी नही सब प्राप्त हे भक्तिमे जो दरिद्र
( शून्य ) हे उसको अयाचनीय क्या है अर्थात् सब याचनीय है ॥ ७ ॥
इत्थं षष्ठीसमासपक्षे प्रयोजनं निर्दिष्टम् ॥ बहुव्रीहिपक्षेतूपाय
समस्तस्य वाह्याभ्यन्तरस्य नित्यसुखादेर्या सम्पत्तिसिद्धि तथा-
त्वप्रकाशः तस्या सम्यगवाप्तिर्यस्याः प्रत्यभिज्ञाया हेतुः । सा
तथोक्ता तस्य महेश्वरस्य प्रत्यभिज्ञा प्रतीमाभिमुख्येन ज्ञानम्।
लोके हि स एवायं चैत्र इति प्रतिसन्धानेनाभिमुखीभूते वस्तुनि
ज्ञानं प्रत्यभिज्ञेति व्यवह्रियते। इहापि प्रसिद्धपुराणसिद्धागमानु-
मानाद्विज्ञातपरिपूर्णशक्तिके परमेश्वरे सति स्वात्मन्यभिमुखी-
भूते तच्छक्तिप्रतिसन्धानेन ज्ञानमुदेति नूनं स एवेश्वरोऽहमिति ।
तामेतां प्रत्यभिज्ञामुपपादयामि । उपपत्तिः सम्भव सम्भवती
तितत्समर्थाचरणेन प्रयोजनव्यापारेण सम्पादयामीत्यर्थ ॥ ८ ॥
षष्ठीसमास पक्षमे प्रयोजन दिखाकर अब बहुव्रीहि समाससे उपाय दिखाते हैं,
वाह्याभ्यन्तर ज्ञान सुखादि समस्त सम्पत्तियोंकी सिद्धि और तत्त्व प्रकाश तथा