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सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 316 में से

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पृष्ठ 175

( १६८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पत्यभिज्ञा-
धर्माथ काम मोक्ष सिद्धिके उपाय अभिनव प्रत्यभिज्ञामात्र माननेवाले कोई माहेश्वर
लोग प्रत्यभिज्ञाशास्त्रका वर्णन करते हैं ॥ १ ॥
तस्येयत्तापि न्यरूपि परीक्षकैः "सूत्रं वृत्तिर्विवृतिर्लघवो बृहती
त्युभे विमर्शिन्त्या । प्रकरणविवरणपञ्चकमिति शास्त्रं प्रत्य-
भिज्ञाया ॥” ॥ २ ॥
उन्होंने उस प्रत्यभिज्ञाशास्त्रका परिमाणभी दिखाया है । सूत्र वृत्ति विवृति
प्रकरण, विवरण पञ्चक इतनाही प्रत्यभिज्ञाशास्त्रहै ॥ २ ॥
तत्रेद् प्रथमं सूत्रम्--"कथञ्चिदासाद्य महेश्वरस्य दास्यं जन-
स्याप्युपकारमिच्छन् । समस्तसम्पत्समवाप्तिहेतुं तत्प्रत्यभि
ज्ञामुपपादयामि” इति ॥ ३ ॥
उसमें प्रथमसूत्र (कथञ्चिदित्यादि) किसी प्रकार महेश्वरके दासत्वको प्राप्त कर
लोककाभी उपकार करनेकी इच्छा करता हुआ (मैं) संपूर्ण संपत्तियोंकी प्राप्तिके हेतु-
भूत प्रत्यभिज्ञादर्शनका प्रतिपादन करता हूं। (यह इस श्लोकका शब्दार्थ है)
इसका विस्तृत अर्थ मूलहीमें करते हैं ॥ ३ ॥
कथञ्चिदिति परमेश्वराभिन्नगुरुचरणारविन्दयुगलसमाराधनेन
परमेश्वरघटितेनैवेत्यर्थः। आसाद्येति आ समन्तात् परिपूर्णतया
सादयित्वा स्वात्मोपभोग्यतां निरर्गलां गमयित्वा तदनेन
विदितवेद्यत्वेन परार्थशास्त्रकरणेऽधिकारो दर्शित अन्यथा
प्रतारणमेव प्रसज्येत ॥ ४ ॥
(कथञ्चित्) परमेश्वरस्वरूप गुरुचरणारविन्द शुश्रूषासे किंवा परमेश्वराराधनसे
(आसाद्य) परिपूर्णरूपसे निर्विघ्न आत्मोपभोग्यताको प्राप्त करकेइन दोनों पदोंसे
सर्वज्ञको परार्थके लिये शास्त्र निर्माणमें हेतु कहा गया अन्यथा वञ्चना
हो जाती ॥ ४ ॥
मायोत्तीर्णा अपि महामायाधिकृता विष्णुविरिञ्चाद्या यदीये-
श्वर्य्यलेशेनेश्वरीभूता सभगवाननवच्छिन्नप्रकाशानन्दस्वात-
न्त्र्यपरमार्थो महेश्वरः। तस्य दास्यं दीयतेऽस्मै स्वामिना सर्व