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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 316 में से

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पृष्ठ 150

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १४१ )
लभ्यते प्रसादश्च न ज्ञानमन्तरेण, अतो ब्रह्मजिज्ञासा कर्त्तव्येति
सिद्धम् ॥ ३९ ॥
अथात इत्यादि प्रथम सूत्रार्थ निरूपण करते हैं-अथशब्द मङ्गल प्रारम्भ, अधि-
कार रूप अर्थत्रयबोधक है और अत पद हेतुबोधक है अतएव गरुडपुराणमे कहा
है नियमसे अथ अत शब्दद्वय पूर्वक सम्पूर्ण सूत्रोंका आरम्भ करना इसमें क्या
नियामक है दोन। शब्दोंका क्या अर्थ है और दोनों श्रेष्ठ क्यों हैं ? हे ब्रह्मन् ! यह
मुझसे कहिये जिससे यथार्थ ज्ञान हो नारदजीके इस प्रकार पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मा-
जी ने कहा आनन्तर्य मंगल और अधिकार अर्थमें अथशब्द और अत.शब्द हेतु
अर्थमे प्रयुक्त होता है भगवान् नारायणकी कृपाके विना मोक्ष नही होता ज्ञानके
विना प्रसन्नताभी नही होती है अतः ब्रह्मजिज्ञासा अवश्य करनी चाहिये ॥ ३९ ॥
जिज्ञास्यब्रह्मणो लक्षणमुक्तं 'जन्माद्यस्य यत ' इति । सृष्टि-
स्थित्यादि यतो भवति तद् ब्रह्मेति वाक्यार्थ । तथाच स्कान्दं
वच.-' उत्पत्तिस्थितिसंहारा नियतिर्ज्ञानमावृतिः । बन्धमोक्षौ
च पुरुषाद्यस्मात् स हरिरेकराट्॥' इति ॥ 'यतो वा इमानि'
इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ॥ ४० ॥
द्वितीय सूत्रसे जिज्ञास्य ब्रह्मका लक्षण कहते हैं सृष्टि स्थिति लय का जो कारण
है वही ब्रह्म है । स्कन्दपुराणमेंभी कहा है उत्पत्ति और स्थिति आदि जिनसे होते हैं
वह स्वय प्रकाशमान हरि हैं ॥ ४० ॥
तत्र प्रमाणमप्युक्त 'शास्त्रयोनित्वात्'इति । 'नावेदविन्मनुते तं बृह-
न्तं तं त्वौपनिषदम्' इत्यादिश्रुतिभ्य तस्यानुमानिकत्वं निराक्रि-
यते । न चानुमानस्य स्वातन्त्र्येण प्रामाण्यमस्ति । तदुक्तं
कौर्मे-“श्रुतिसाहाय्यरहितमनुमानं न कुत्रचित् । निश्चयात् साध-
येदर्थं प्रमाणान्तरमेव च ॥ श्रुतिस्मृतिसहायं यत् प्रमाणान्त-
रमुत्तमम् । प्रमाणपदवी गच्छेदत्रात्र कार्या विचारणा" इति ॥४१॥
तृतीय सूत्रसे ब्रह्ममें प्रमाण दिखाते हैं जो वेदवेत्ता नही वह ब्रह्मको नहीं जान
सकते उपनिषत्प्रतिपाद्य पुरुषको जानना चाहता हूं इत्यादि श्रुतियोंसे अनुमान
विषयत्वनिराकरण कर केवल शब्दप्रतिपाद्यत्व प्रतिपादन करते हैं अनुमान स्वतन्त्र-