सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पूर्णप्रज्ञ-
स्वातन्त्र्यशक्तिविज्ञानसुखाद्यैरखिलैर्गुणै ॥ नि सीमत्वेन ते सर्वे
तद्वशा सर्वदेवता ॥” इति ॥ “विष्णुं सर्वगुणैः पूर्ण ज्ञात्वा संसा-
र्व्वर्जित । निर्दुःखानन्दभुङ्नित्यं तत्समीपे स मोदते ॥ मुक्ता-
नां चाश्रयो विष्णुरधिकाधिपतिस्तथा । तद्वशा एव ते सर्वे सर्व-
दैव स ईश्वर ॥” इति च ॥ ३४ ॥
स्वातन्त्र्य, ज्ञान, शक्ति, सुखादि अनेक गुणो करके निस्सीम होनेसे सम्पूर्ण
देवता श्रीहरिके आधीन है सम्पूर्ण गुणोंसे युक्त विष्णुकी उपासनाद्वारा जो संसारसे
मुक्त हो गया है वह दु खशून्य परमानन्दसे युक्त होकर भगवत्समीपमें आनन्दको
प्राप्त होता है विष्णु मुक्ताक आश्रय और अधिक ( ब्रह्मादिक ) के भी
आधिपति है अतः सम्पूर्ण देवता उनके आधीन हैं, सदा एक विष्णुही
ईश्वर है ॥ ३४ ॥
एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानञ्च प्रधानत्वकारणत्वादिना युज्यते न
तु सर्वमिथ्यात्वेन । न हि सत्यज्ञानेन मिथ्याज्ञानं सम्भवति ।
यथा प्रधानपुरुषाणां ज्ञानाज्ञानाभ्यां ग्रामो ज्ञात अज्ञात इत्ये-
वमादिव्यपदेशो दृष्ट एव। यथा च कारणे पितरि ज्ञाते जाना-
॰ त्यस्य पुत्रमिति । अन्यथा 'यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं
मृण्मयं विज्ञातम्' इत्यत्र एकपिण्डशब्दौ वृथा प्रसज्येयाता
मृदा विज्ञातयेत्येतावतैव वाक्यस्य पूर्णत्वात् ॥ ३५ ॥
एक विज्ञानसे सर्वविज्ञान प्रतिज्ञाभी प्रधानत्व कारणत्वादि धर्मयुक्त होनेसे सङ्गत
होती है सर्वमिथ्यात्वमें नहीं होती एक वस्तुके सत्यज्ञानसे अन्यका मिथ्याज्ञान
सम्भव नहीं है प्रधानके ज्ञानसे अप्रधान ग्रामादि ज्ञान दृष्ट है जैसे कारणज्ञानसे
कार्यज्ञान दृष्ट है तैसे ब्रह्म जगत्का कारण है अतः ब्रह्मज्ञानसे कार्यभूत जगत्का
ज्ञान होता है । यदि सर्वका मिथ्यात्व माने तो एक मृत्तिकाके ज्ञानसे कार्यभूत
घटशरावादि सब ज्ञात होते हैं इस दृष्टान्तमें एक शब्द और मृत्पिण्डपद व्यर्थ
होंगे मृत्तिकाज्ञानसे सब ज्ञात होते हैं इतनेहीसे वाक्य पर्याप्त होता है एव लक्षणादि
दोष पूर्व [???] ॥ ३५ ॥
न च वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यमित्येतत्
कार्यस्य मिथ्यात्वमाचष्टे इत्येष्टव्य वाचारम्भणं विकारो यस्य