सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १०३ )
जिस प्रकार रामकृष्णदिशब्दरामकृष्णादिशरीरबोध होते हुए भी परमात्मपर्य-
न्तबोधक हैं इसीमें किसीको विप्रतिपत्ति नहीं है. क्योंकि “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति
सर्वे वेदा यत्रैकीभवन्ति' । आपलोग समस्तशब्दोंकी शाश्वतपरमात्मामे विश्रान्ति
अर्थात् तत्पर्यन्तबोधक माने हैं जिस प्रकार घटादिकोंके रूपाकादिकसे रूपान्तर-
नामान्तरादिक होते हैं तथा प्रतीति न होनेसे केवल लक्षणाहीसे एकदेशका बोध
होता है इस श्लोकसे समस्तशब्दोके परमात्मपर्यन्तबोधकत्व प्रतिपादन किया है ।
यह सब विषय वेदार्थसग्रहमें विस्ताररूपसे प्रतिपादित हैं ॥ २४ ॥
किञ्च सर्वप्रमाणस्य सविशेषविषयतया निर्विशेषवस्तुनि न
किमपि प्रमाणं समस्ति निर्विकल्पकप्रत्यक्षेऽपि सविशेषमेव
वस्तु प्रतीयते । अन्यथा सविकल्पके सोयमिति पूर्वप्रतिपन्न-
प्रकारविशिष्टप्रतीत्यनुपपत्तेः ॥ २५ ॥
निर्विशेष वस्तुप्रतिपादक प्रमाणके अभावको कहते हैं-( किञ्चेति ) सिद्धान्तके
मतमें प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द तीन प्रमाण हैं यह तीनों सविशेष विषय हैं तथाहि
सविकल्पक ओर निर्विकल्पक भेदसे प्रत्यक्ष दो प्रकार है जाति, गुण, अवयव
सन्निवेशादि अनेक पदार्थ विशिष्ट विषयग्रहण सविकल्पक प्रत्यक्ष है अत. यह
सविशेष विषय है । निर्विकल्पक प्रत्यक्ष भी संस्थानरूप जात्यादि विशिष्ट ही रहता
है अत एव सविकल्पक दशामें वही यह है. ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती हे अन्यथा
निर्विकल्पमें यावत् विशेष शून्य हो तो उसीको सविकल्पक दशामें 'सोऽयम्' ऐसी
प्रत्यभिज्ञा कदापि न हो सकेगी परन्तु निर्विकल्पक और सविकल्पकमें भेद इतना
ही है कि सविकल्पकमें गोत्वादि अनेक व्यक्तिमें अनुवृत्ताकार प्रतीत होता हे नि-
र्विकल्पकमें केवल एकही व्यक्तिमें प्रतीत होता है. शब्दभी सविशेष विषय है क्योंकि
पदरूप अथवा वाक्यरूप शब्द है प्रकृतिप्रत्यय योगसे पद होता है प्रकृत्यर्थ अन्य हे
और प्रत्ययार्थ अन्य है उन दोनोंका सम्बन्ध विशेष्य विशेषणभावादि होता है
यथा-पाचक इस पदमें पाच प्रकृति अक प्रत्यय है प्रकृतिका अर्थ पाक क्रिया है
प्रत्ययका अर्थ कर्ता हे विशिष्टका अर्थ पाककर्त्ता है अनेक पदार्थोंका संसर्ग होनेसे
यह सविशेष हे वाक्य पदसमूह होनेसे सुतरा सविशेष रहेगा । अनुमान भी सविशेष
विषय हे तथाहि अनुमानमें व्याप्ति पक्षधर्मतादि ज्ञान कारण है व्याप्ति प्रत्यक्ष दृष्टमें
होती है प्रत्यक्ष सविशेष विषय होनेसे तन्मूलक अनुमानभी सविशेष विषय हे
स्वानुभव मी "मैं अमुक वस्तु जानता हू" इत्यादि यत्किञ्चित् प्रकार विशिष्ट ही
रहता है अतः निर्विशेष वस्तुमें कोई प्रमाणही नहीं है ॥ २५ ॥