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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

२५४ शब्द संग्रह
॥ उपदेश ॥
(१)
कोई सफान देखा दिल का, साँचा बना झिलमिल का ॥ टेक
कोइ बिल्ली कोइ बगुला देखा, पहिरे फकीरी खिलका१।
बाहर मुख से ज्ञान छाँटते, भीतर कोरा छिलका ॥ १ ॥
भजन करन मैं गजब आलसी, जैसे थका मँजिल का ।
औरन के पीसन मैं सुरमा, जैसे बहा सिल का ॥ २ ॥
पढ़े लिखे कुछ ऐसेहि वैसे, बड़ा घमंड अकिल का ।
जहरी बचन यौं मुख से निकलैं, साँप निकलता बिलका ॥३
भजन बिना सब जप तप झूठा, झूठ तवक्क़ा फजल२ का ।
क्या कहिये गुरुदेव न पाया, महरम३ आँख के तिल का ॥४
(२)
समुझ बूझ जिय मैं बन्दे, क्या करना है क्या करता है ।
गुन का मालिक आपै बनता, अरु दोष राम पर धरता है ॥१
अपना धरम छोड़ि औरौं के, ओछे धरम पकरता है ।
अजब नसे की गफलत आई, साहिब को नहिं डरता है ॥२॥
जिनके खातिर जान माल से, बहि बहि के तू मरता है ।
वे क्या तेरे काम पड़ेंगे, उनका लहना भरता है ॥ ३ ॥
देव धरम चाहे सो करि ले, आवागमन न टरता है ।
प्यारे केवल राम नाम से, तेरा मतलब सरता है ॥ ४ ॥
फुटकर
कवित्त
काहू के अधार सेवा बनिज व्यौपार को है,
काहू के अधार थित बित खेत गाम को ॥
(१) ख़िरक़ा=गदड़ी । (२) बड़ाई की आशा । (३) भेदी ।

फुटकर २५५
काहू के अधार तन सार भ्रात बंधुन को,
काहू के अधार प्रिय सार निज नाम को ॥
काहू के अधार विद्या बुद्धि अरु बल को है,
काहू के अधार हाथी घोड़ा धन धाम को ॥
मैं तो निराधार मेरी हरिहि करेंगे सार,
मेरे तो अधार एक जानो हरि नाम को ॥
कवित्त
कब को पुकारत हौँ सुनौ नहीं एको बात,
एहो नंदलाल तुम कैसे प्रतिपाल हौ ॥
कहैं ह दयाल सो तो दया हू न देखियत,
मेरी मति ऐसी ओछी नीके पसुपाल हौ ॥
धस्यो हो नृसिंह रूप तबहीं प्रह्लाद काज,
अब तो न लाज कछू गोधन मैं ग्वाल हौ ॥
डास्यो तेल कान मैं कि बस्यो जाय कानन१ मैं,
सेस सेज लेटि कि धौँ पौंढ़े जा पताल हौ ॥
सवैया
आईं सवै ब्रज गोप लली, ठिठकीं ह्वै गली जमुना जल न्हाने १
औचक आय मिले रसखान, बजावत बेनु सुनावत तानें ॥२
हाहा [ सिसकीं सिगरी, मति मैन२ हरी हियरा हुलसाने ३
घूम दिमाने३ अमाने चकोर से, ओर से दोऊ चलैँ दृग बानैँ॥४
सवैया
सुनिये सब की कहिये न कछू, रहिये इमि या भव बागर४ सैँ१
करिये व्रत नेम सचाई लिये, जिन तैं तरिये भव सागर मैं ॥२
मिलिये सब सोँ दुरभाव बिना, रहिये सतसंग उजागर मैं ३
रसखान गुबिंदहि यौं भजिये, जिमि नागरि५ को चित गागर मैं ॥४

(१) वन। (२) कामदेव। (३) दीवाने। (४) झाड़ी। (५) चतुर स्त्री।

२५६ शब्द संग्रह
सवैया
वह साँवरो नन्द को छैल अली, अब तो अति ही इतरान लगो॥१
नित घाटन बाटन कुंजन में, मोहिं देखत ही नियरान लगो॥२
रसखान बखान कहा कहिये, तकि सैनन सों मुसकान लगो॥३
तिरछी बरछी सम मारत है, दृग बान कमान सु का...
शब्द
कहँ गये प्यारे, झलक दिखा के ॥ टेक ॥
हिरदै बसी माधुरी मूरत, कस जाव प्रीतम खूँट छुड़...
बिरह अगिन ने तन मन फूँका, हिया जुड़ावो अमी प...
भई बावरी इत उत डोलौं, तन मन की सब सुद्धि...
मैं तो। हाँ पतितन को नायक, कैसे बचिहै। पन¹ बिस...
अब तो कर मैं लीन्ह सिँधौरा, तुम से मिलिहौँ दहँ ज...
बाँह गहे की लाज तुम्हीं को, का पै जावौँ तुम्हरो क...
प्रेम प्रसाद देहु निज स्वामी, मोको दासनदास बना...
रुबाई
ख़ाक आप को समझना, इकसीर² है तो यह है।
इख़लाक़³ सब से रखना, तसख़ीर⁴ है तो यह ।
सब काम अपना करना, तक़दीर⁵ के हवाले ।
नज़दीक आरिफ़ों⁶ के, तदवीर है तो यह ॥
रुबाई
वीराँ किया जब आप को बस्ती नज़र पड़ी
जब आप नेस्त हम हुए हस्ती नज़र पड़ी ॥
देखा तो ख़ाक्सारी ही आली मुक़ाम है ।
ज्यों ज्यों बलंद हम हुए पस्ती नज़र पड़ी ॥
॥ इति ॥
(१) पतित-पावन होने का प्रण । (२) रसायन । (३) आदर ...
(४) बशी करन । (५) मौज । (६) साधों ।

शुद्धि पत्र
शब्द संग्रह
पंक्ति अशुद्ध शुद्ध
६ बिछुड़ बिछुड़ैँ
१५ गरीबा गरीबी
५ भाँड़े भाँड़ैँ
६ फाँसी१ फाँसी°
५ कारति कीरति
४ (जीवन- भाजराज भोजराज
चरित्र की)
१६ पड़ा पड़ी
" राग रोग
८ बिहारा विहारी
१२ तेर तेरे
५ उघाड़े उघाड़ो
१० (जीवन चरित्र को) लख लिख
१ (नोट की) श्रथ अर्थ°
३ (नोट की) सम्बन्धा सम्बन्धी
४ इद्रिन इंद्रिन
२ कैस कैसैँ
१८ मँ मैं
३ म मैं
१३ लान्हा लीन्ह्यो
नोट हू हूँ
६ रँग रंग
१७ ह हैं
२० अयौ आयौ

२ शुद्धि पत्र
पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध
१६६ नोट फिर मौन (चुप) फिर मौन गो. १
साधकर बैठे आर साध कर गो. २
धन दोलत और धन गो. ३
१७३ नोट खान
,, ,, मे
१७४ ४ अठौ
१७६ ४ (चरनदास की) पडित
१८८ ७ (नोट की) ह
२०७ नोट बगैर
२५० १७ बयोँ
२५४ नोट गड़ड़ी
२५५ ६ ह
२५६ १४ तसख़ीर