संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 36, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ संस्कारविधिः
उस घृत में से चमसा कि जिसमें छह मासा ही घृत आवे
ऐसा बनाया हो, भरके नीचे लिखे मन्त्र से पाँच आहुति देनी—
ओम् अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व
चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन
समेधय स्वाहा॥ इदमग्नये जातवेदसे—इदन्न मम॥ ५॥
तत्पश्चात् अञ्जलि में जल लेके वेदी के पूर्व आदि दिशा
और चारों ओर छिड़कावें। उसके ये मन्त्र हैं—
ओम् अदितेऽनुमन्यस्व॥ इस मन्त्र से पूर्व।
ओम् अनुमतेऽनुमन्यस्व॥ इससे पश्चिम।
ओं सरस्वत्यनुमन्यस्व॥ इससे उत्तर और—
ओं देव॑ सवितः प्रसु॑व य॒ज्ञं प्रसु॑व य॒ज्ञप॑तिं भगा॑य।
दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॒त॒पूः केतं॑ नः पुनातु वा॒चस्पति॒र्वाचं॑ नः
स्वदतु॥ —यजुः० अ० ३०। मं० १॥
इस मन्त्र से वेदी के चारों ओर जल छिड़कावें।
इसके पश्चात् सामान्यहोमाहुति गर्भाधानादि प्रधान संस्कारों
में अवश्य करें। इसमें मुख्य होम के आदि और अन्त में जो
आहुति दी जाती हैं, उनमें से यज्ञकुण्ड के उत्तरभाग में जो
एक आहुति, और यज्ञकुण्ड के दक्षिणभाग में दूसरी आहुति
देनी होती है, उनका नाम “आघाराहुति” है और जो कुण्ड
के मध्य में आहुतियाँ दी जाती हैं, उनका नाम “आज्यभागाहुति”
है। सो घृतपात्र में से स्रुवा को भर अंगूठा, मध्यमा, अनामिका
से स्रुवा को पकड़के—
ओम् अग्नये स्वाहा॥ इदमग्नये—इदं न मम॥ -
—इस मन्त्र से वेदी के उत्तरभाग अग्नि में।
ओं सोमाय स्वाहा॥ इदं सोमाय—इदं न मम॥
—इस मन्त्र से वेदी के दक्षिणभाग में प्रज्वलित
समिधा पर आहुति देनी। तत्पश्चात्—