संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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अर्थ—मनुष्यों को योग्य है कि काम से, अर्थात् झूठ से
कामना सिद्ध होने के कारण से वा निन्दा-स्तुति आदि के भय
से भी धर्म का त्याग कभी न करें और न लोभ से। चाहे झूठ,
अधर्म से चक्रवर्ती राज्य भी मिलता हो तथापि धर्म को छोड़कर
चक्रवर्ती राज्य को भी ग्रहण न करें। चाहे भोजन-छादन, जल-
पान आदि की जीविका भी अधर्म से हो सके वा प्राण जाते
हों, परन्तु जीविका के लिए भी धर्म को कभी न छोड़ें, क्योंकि
जीव और धर्म नित्य हैं तथा सुख-दुःख दोनों अनित्य हैं। अनित्य
के लिए नित्य का छोड़ना अतीव दुष्ट कर्म है। इस धर्म का
हेतु कि जिस शरीर आदि से धर्म होता है, वह भी अनित्य
है। धन्य वे मनुष्य हैं जो अनित्य शरीर और सुख-दुःखादि
के व्यवहार में वर्त्तमान होकर नित्य धर्म का त्याग कभी नहीं
करते हैं॥१५॥
जिस सभा में बैठे हुए सभासदों के सामने अधर्म से धर्म
और झूठ से सत्य का हनन होता है, उस सभा में सब सभासद्
मरे-से ही हैं॥१६॥
सब मनुष्यों को यह निश्चय जानना चाहिए कि चाहे
सांसारिक अपने प्रयोजन की नीति में वर्त्तनेहारे चतुर पुरुष निन्दा
करें वा स्तुति करें, लक्ष्मी प्राप्त होवे, अथवा नष्ट हो जावे, आज
ही मरण होवे, अथवा वर्षान्तर में मृत्यु प्राप्त होवे तथापि जो
मनुष्य धर्मयुक्त मार्ग से एक पग भी विरुद्ध नहीं चलते वे ही
धीर पुरुष धन्य हैं॥१७॥
सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒ सं वो॒ मनां॑सि जानताम्।
दे॒वा भा॒गं यथा॒ पूर्वे॑ संजाना॒ना उ॒पास॑ते ॥१॥
—ऋ० म० १०। सू० १९१। मं० २॥
दृष्ट्वा रू॒पे व्याक॑रोत् स॒त्यानृ॒ते प्र॒जाप॑तिः।
अश्र॑द्धामनृ॒तेऽद॑धाच्छ्र॒द्धां स॒त्ये प्र॒जाप॑तिः॥२॥
—यजु० अ० १९। मं० ७७॥