संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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न संवसेच्च पतितैर्न चाण्डालैर्न पुक्कशैः ।
न मूर्खैर्नावलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः ॥७॥
नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः ।
आमृत्योः प्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम् ॥८॥
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥९॥
अर्थ—हे स्त्री-पुरुषो ! तुम जो धर्म, धन और बुद्ध्यादि
को अत्यन्त शीघ्र बढ़ानेवाले हितकारी शास्त्र हैं उन्हें और वेद
के भागों की विद्याओं को नित्य देखा करो ॥५॥
मनुष्य जैसे-जैसे शास्त्र का विचार कर उसके यथार्थ भाव
को प्राप्त होता है, वैसे-वैसे अधिक-अधिक जानता है और
इसकी प्रीति विज्ञान ही में होती जाती है ॥६॥
सज्जन गृहस्थ लोगों को योग्य है कि जो पतित, दुष्ट कर्म
करनेवाले हों उनके साथ तथा, चाण्डाल, कञ्जर, मूर्ख, मिथ्या-
भिमानी और नीच निश्चयवाले मनुष्यों के साथ कभी निवास
न करें ॥७॥
गृहस्थ लोग जो कभी पहले पुष्कल धनी होके पश्चात्
दरिद्र हो जाएँ, उससे अपने आत्मा का अवमान न करें कि
'हाय हम निर्धन हो गये' इत्यादि विलाप भी न करें, किन्तु
मृत्युपर्यन्त लक्ष्मी की उन्नति में पुरुषार्थ किया करें और लक्ष्मी
को दुर्लभ न समझें ॥८॥
मनुष्य सदैव सत्य बोलें और दूसरे को कल्याणकारक
उपदेश करें। काणे को काणा और मूर्ख को मूर्ख आदि अप्रिय
वचन उनके सन्मुख कभी न बोलें और जिस मिथ्याभाषण से
दूसरा प्रसन्न होता हो, उसे भी न बोलें, यह सनातन धर्म है ॥९॥
अभिवादयेद् वृद्धाँश्च दद्याच्चैवासनं स्वकम्।
कृताञ्जलिरुपासीत गच्छतः पृष्ठतोऽन्वियात् ॥१०॥