संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् २२९
जिसमें सूर्य का प्रतिभास आवे, वैसी प्रकाशस्वरूप, भूमि के
समान दृढ़ शाला बनावे (च) और (यत्) जो (व्यचः) उसकी
व्याप्ति, अर्थात् विस्तार है, हे स्त्रि! (ते) तेरे लिए है, (तेन)
उसी से युक्त (इमाम्) इस (शालाम्) घर को बनाता हूँ, तू
इसमें निवास कर और मैं भी निवास के लिए इसको (प्रतिगृह्णामि)
ग्रहण करता हूँ। (यत्) जो उसके बीच में (अन्तरिक्षम्) पुष्कल
अवकाश और (रजसः) उस घर का (विमानम्) विषेश मान-
परिमाणयुक्त लम्बी, ऊँची छत और (उदरम्) भीतर का प्रसार
विस्तारयुक्त होवे, (तत्) उसे (शेवधिभ्यः) सुख के आधाररूप
अनेक कक्षाओं से सुशोभित (अहम्) मैं (कृण्वे) करता हूँ।
(तेन) उस पूर्वोक्त लक्षणमात्र से युक्त (शालाम्) शाला को
(तस्मै) उस गृहाश्रम के सब व्यवहारों के लिए (प्रतिगृह्णामि)
ग्रहण करता हूँ॥ ३ ॥
जो (शाले) शाला (ऊर्जस्वती) बहुत बलारोग्य, पराक्रम
को बढ़ानेवाली और धन-धान्य से पूरित सम्बन्धवाली, (पयस्वती)
जल, दूध, रसादि से परिपूर्ण, (पृथिव्याम्) पृथिवी में (मिता)
परिमाणयुक्त (निमिता) निर्मित की हुई (विश्वान्नम्) सम्पूर्ण
अन्नादि ऐश्वर्य को (बिभ्रती) धारण करती हुई (प्रतिगृह्णतः)
ग्रहण करनेवालों को रोगादि से (मा हिंसीः) पीड़ित न करे,
वैसा घर बनाना चाहिए ॥ ४ ॥
ब्रह्म॑णा॒ शालां॒ निर्मि॑तां क॒विभि॒र्निर्मि॑तां मि॒ताम्।
इन्द्रा॒ग्नी र॑क्षतां॒ शाला॑म॒मृतौ॒ सोम्यं॒ सदः॑ ॥ ५ ॥
अर्थ— (अमृतौ) स्वरूप से नाशरहित (इन्द्राग्नी) वायु और
पावक, (कविभिः) उत्तम विद्वान् शिल्पियों ने (मिताम्)
प्रमाणयुक्त, अर्थात् माप में ठीक जैसी चाहिए वैसी (निमिताम्)
बनाई हुई (शालाम्) शाला को और (ब्रह्मणा) चारों वेदों के
जाननेवाले विद्वान् द्वारा सब ऋतुओं में सुख देनेवाली (निमिताम्)