सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 231

गृहाश्रमप्रकरणम् २२७
इन मन्त्रों से प्रधानहोम की पाँच आज्याहुति करके—
ओं सीतायै स्वाहा॥
ओं प्रजायै स्वाहा॥
ओं शमायै स्वाहा॥
ओं भूत्यै स्वाहा॥
इन चार मन्त्रों से चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे
(यदस्य०) मन्त्र से स्विष्टकृत् होमाहुति एक ऐसे पाँच स्थालीपाक
की आहुति देके, पश्चात् पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति
आठ, पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार, ऐसे बारह
आज्याहुति देके, पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान,
ईश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण करके यज्ञ की
समाप्ति करें॥
अथ शालाकर्मविधिं वक्ष्यामः
‘शाला’ उसे कहते हैं—जो मनुष्य और पश्चादि के रहने,
अथवा पदार्थ रखने के अर्थ गृह वा स्थानविशेष बनाते हैं।
इसके दो विषय हैं—एक प्रमाण और दूसरा विधि। उसमें से
प्रथम प्रमाण और पश्चात् विधि लिखेंगे।
अत्र प्रमाणानि
उ॒पमि॑तां प्र॒तिमि॑ता॒मथो॑ प॒रिमि॑तामु॒त।
शाला॑या वि॒श्ववा॑राया न॒द्धानि॒ वि चृ॑तामसि॥ १॥
ह॒वि॒र्धान॑म॒ग्निशा॒लं पत्नी॑नां॒ सद॑नं॒ सद॑:।
सदो॑ दे॒वाना॑मसि देवि शाले॥ २॥
अर्थ:—मनुष्यों को योग्य है कि जो कोई किसी प्रकार
का घर बनावें तो वह (उपमिताम्) सब प्रकार की. उत्तम