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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 227

गृहाश्रमप्रकरणम् २२३
ओम् अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान् विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि
वि॒द्वान्। यु॒यो॒ध्य॒स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम
स्वाहा॑ ॥ ८ ॥ —यजुः० अ० ४०। मं० १६ ॥
इन आठ मन्त्रों से एक-एक मन्त्र करके एक-एक आहुति
देनी, ऐसे आठ आहुति देके—
ओम् सर्वं वै पूर्णꣳ स्वाहा ॥
इस मन्त्र से तीन पूर्णाहुति, अर्थात् एक-एक बार पढ़के
एक-एक करके तीन आहुति देवे ॥
'इत्यग्निहोत्रविधिः संक्षेपतः समाप्तः ॥ २ ॥
अथ पितृयज्ञः
अग्निहोत्रविधि पूर्ण करके तीसरा पितृयज्ञ करे, अर्थात् जीते
हुए माता-पिता आदि की यथावत् सेवा करना 'पितृयज्ञ' कहाता
है ॥ ३ ॥
अथ बलिवैश्वदेवविधिः
ओम् अग्नये स्वाहा।
ओं सोमाय स्वाहा ॥
ओम् अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा।
ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥
ओं धन्वन्तरये स्वाहा ॥
ओं कुह्वै स्वाहा ॥
ओं अनुमत्यै स्वाहा ॥
ओं प्रजापतये स्वाहा ॥
ओं द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा ॥
ओं स्विष्टकृते स्वाहा ॥