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सर्वकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 222

२१८ संस्कारविधिः
ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः॥ इस मन्त्र से दोनों नेत्रों पर।
ओं स्वः पुनातु कण्ठे॥ इस मन्त्र से कण्ठ पर।
ओं महः पुनातु हृदये॥ इस मन्त्र से हृदय पर।
ओं जनः पुनातु नाभ्याम्॥ इससे नाभि पर।
ओं तपः पुनातु पादयोः॥ इससे दोनों पगों पर।
ओं सत्यं पुनातु पुनः शिरसि॥ इससे पुनः मस्तक पर।
ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र॥
इस मन्त्र से सब अङ्गों पर छींटा देवे।
पुनः पूर्वोक्त रीति से प्राणायाम की क्रिया करता जाए और
नीचे लिखे मन्त्र का जप भी करता जाए—
ओं भूः। ओं भुवः। ओं स्वः। ओं महः। ओं जनः। ओं
तपः। ओं सत्यम्॥
इसी रीति से कम-से-कम तीन और अधिक-से-अधिक
इक्कीस प्राणायाम करे।
तत्पश्चात् सृष्टिकर्त्ता परमात्मा और सृष्टिक्रम का विचार
नीचे लिखित मन्त्रों से करे और जगदीश्वर को सर्वव्यापक,
न्यायकारी, सर्वत्र, सर्वदा सब जीवों के कर्मों का निश्चित द्रष्टा
मानके पाप की ओर अपने आत्मा और मन को कभी न जाने
देवे, अपितु उसे सदा धर्मयुक्त कर्मों में वर्तमान रक्खे—
ओम् ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्य॑जायत।
ततो॒ रात्र्य॑जायत॒ ततः॑ स॒मुद्रो अ॑र्ण॒वः॥१॥
स॒मु॒द्राद॑र्ण॒वादधि॑ संवत्स॒रो अ॑जायत।
अ॒हो॒रा॒त्राणि॑ वि॒दध॒द्विश्व॑स्य मिष॒तो व॒शी॥२॥
सूर्या॑च॒न्द्रमसौ॑ धा॒ता य॑थापू॒र्वम॑कल्पयत्।
दिवं॑ च पृथि॒वीं चा॒न्तरि॑क्षमथो॒ स्वः॑॥३॥
—ऋ० मं० १०। सू० १९०॥