संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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अर्थः—जो धर्म ही से पदार्थों का सञ्चय करना है, वही
सब पवित्रताओं में उत्तम पवित्रता है, अर्थात् जो अन्याय से
किसी पदार्थ का ग्रहण नहीं करता, वही पवित्र है, और जल-
मृत्तिकादि से जो पवित्रता होती है, वह धर्म के सदृश उत्तम
नहीं है॥२६॥
विद्वान् लोग क्षमा से, दुष्कर्मकारी सत्संग और विद्यादि
शुभ गुणों के दान से, गुप्त पाप करनेवाले विचार से पापों को
त्याग कर और ब्रह्मचर्य तथा सत्यभाषणादि से वेदवित् उत्तम
विद्वान् शुद्ध होते हैं॥२७॥
जल से ऊपर के अङ्ग पवित्र होते हैं, आत्मा और मन
नहीं। मन तो सत्य मानने, सत्य बोलने और सत्य करने से
शुद्ध और जीवात्मा विद्या, योगाभ्यास और धर्माचरण ही से
पवित्र तथा बुद्धि ज्ञान से ही शुद्ध होती है, जल मृत्तिकादि
से नहीं॥२८॥
गृहस्थ लोग छोटों, बड़ों वा राजकार्यों के सिद्ध करने में
कम-से-कम दश, अर्थात् ऋग्वेदज्ञ, यजुर्वेदज्ञ, सामवेदज्ञ,
हैतुक (=नैयायिक), तर्ककर्त्ता, नैरुक्त (=निरुक्तशास्त्रज्ञ),
धर्माध्यापक, ब्रह्मचारी, स्नातक और वानप्रस्थ विद्वानों, अथवा
अतिन्यूनता करे तो तीन वेदवित् (=ऋग्वेदज्ञ, यजुर्वेदज्ञ और
सामवेदज्ञ) विद्वानों की सभा से कर्त्तव्याकर्त्तव्य, धर्म और अधर्म
का जैसा निश्चय हो, वैसा ही आचरण किया करें॥२९॥
और जैसा विद्वान् लोग दण्ड ही को धर्म जानते हैं, वैसा
सब लोग जानें, क्योंकि दण्ड ही प्रजा का शासन, अर्थात् नियम
में रखनेवाला, दण्ड ही सबका सब ओर से रक्षक और दण्ड
ही सोते हुओं में जागता है। चोरादि दुष्ट भी दण्ड ही के भय
से पापकर्म नहीं कर सकते॥३०॥
दण्ड को अच्छे प्रकार चलानेवाले उस राजा को श्रेष्ठ कहते
हैं जो सत्यवादी, विचार करके ही कार्य का कर्त्ता, बुद्धिमान्,