सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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"हिन्दीसांख्य" है। पाठकों के सुखपूर्वक शास्त्र में प्रवेश के
लिये इसके आरम्भ में चित्रावली लगाई है, जिस के द्वारा
सांख्य के तत्वों को पाठक संक्षेप से अनायास समझ सकेंगे,
और फिर ग्रन्थ के पड़ने में भी उन्हें बहुत सुविधा होगी।
ग्रन्थ के भीतर जिस कारिका (श्लोक) का अर्थ आरम्भ होता
है, वहां पर भी सुख बोध के लिये विषयबोधक शीर्षक, उस
के नीचे कारिका और उस के नीचे उसी की व्याख्या है।
कहीं२ ग्रन्थ के भीतर भी समझाने के लिये चित्र लगाये गये
हैं। विषय के क्लिष्ट होने के कारण जहां सरलता नहीं हो
सकी है, उस के लिये विद्वानों से क्षमा प्रार्थनापूर्वक निवेदन
है, कि- वे उस की सूचना देवें, जिससे कि- वह सुधार दूसरी
आवृत्ति में कर दिया जावे।
भागवत सांख्य और यह सांख्य
भागवत पुराण के सांख्य में भी प्राकृतिक तत्व २४ ही हैं
"पञ्चभिः पञ्चभिर्ब्रह्मन् चतुर्भिर्दशभिस्तथा ।
एतच्चतुर्विंशतिकं गणं प्राधानिकं विदुः"
( श्री० भा० ३, २६; ११ )
अर्थात्- ५ महाभूत (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आका-
श) ५ तन्मात्र (गन्ध, रस, रूप, स्पर्श शब्द) ४ अन्तः करण
(मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त) ५ ज्ञानेन्द्रियें (श्रोत्र, त्वचा,
दृक्, रसन, नासिका) ५ कर्मेन्द्रियें (वाणी, कर, चरण,
लिङ्ग, गुद) यह प्रधान या प्रकृति का गण है।
ईश्वरकृष्णीय सांख्य में २५ वां तत्व पुरुष को बताया
गया है, उसके स्थान में भागवत में काल तत्व कहा है।
"एतावानेव संख्यातो ब्रह्मणः सगुणस्य ह ।,
संनिवेशो मया प्रोक्तो यः कालः पञ्चविंशकः" ॥
( श्री० भा० ३, २६, १५ )